dil toh bachha hai
बंधन कई प्रकार के होते हैं , उनमें से सबसे अनमोल है माँ की ममता। मेरी गोद भराई का कार्यक्रम रखा गया। मेरे माता पिता को भी बुलवाया गया। जिस तरह कोई नन्हा बालक पहली बार पाठशाला से घर आते ही माँ और बाबा से लिपट जाता है , उसी प्रकार मैं भी बहुत महीनों बाद माँ को देखकर गले लग गयी जिससे कलेजे में ठंडक पड़गई। उन दिनों पहली डिलीवरी के लिए मायके जाने का रिवाज़ था। इस अधिकार को भी बड़ी मुश्किल से पाया था मैंने।
ससुरजी को मेरे पिताजी के काम धंदे की परेशानियों का अंदाज़ा था , इसलिए वे नहीं चाहते थे की मेरा खर्चा मेरे पिताजी का बोझ बढ़ादे। पिताजी काफी क़र्ज़ में डूबे हुए थे , फिर भी वे मुझे लेने आये थे क्योंकि मैं उनकी लाड़ली थी। माताजी को मेरे गर्भ की स्थिति मालूम थी इसलिए मुझे सफर में भेजना नहीं चाहते थे। उन्हें लगता था की उनका होने वाला पोता कही मेरे मायके जाने की ज़िद्द में दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म न हो जाए।
मुझे उस वक़्त सबको मनाने में बहुत वक़्त लगा। आख़िर कार जब जीवन साथी से फ़ोन पे पूछा गया कि क्या निर्णय लेना होगा भेजने के बारे में तो उन्होंने निःसंकोच कह दिया जैसा उनकी बहू चाहे वही करो। बस फिर ससुरजी ने भी हाँ में हाँ मिलादी। मगर माताजी ने मुझे बेमन रुखसत किया। साथ में एक ज़िम्मेदारी भी दी कि मुझे नायलॉन की रस्सियों से हैंड बैग बनाने होंगे , चारों नंदों के लिए। ऐसे वक़्त में भी वे अपने काम करवाना नहीं भूले।
असल में मेरा वज़न बिलकुल नहीं बढ़ रहा था ,मैं सिर्फ ३५ किलो की थी। सात महीनों में थोड़ा सा भी वज़न नहीं बढ़ा। मुझे लगता था कि अगर माँ के पास रहूंगी तो कुछ सुधार आएगा। मुझे दुलार और सुकून की बहुत ज़रुरत थी। माँ के आँचल में जो राहत मिली वह ऐसे लगता था मनो जन्मों जन्मों की प्यास मिट गयी। जब मैं माँ और पिताजी के साथ रवाना हुई तब मेरे गर्भ का सातवा महीना पूरा होने को था। ३ दिन का रेल का सफर थकान भरा था। आगे मेरी भाभी को भी उनके मायके डिलीवरी के लिए भेजा गया था। फिर मुझे लेजाया गया। उस बात की भी कोई अनोखी मान्यता थी जिसके कारण एक गर्भवती को दुसरी गर्भवती सदस्य के साथ रखना शुभ नहीं मानते थे।
ससुरजी को मेरे पिताजी के काम धंदे की परेशानियों का अंदाज़ा था , इसलिए वे नहीं चाहते थे की मेरा खर्चा मेरे पिताजी का बोझ बढ़ादे। पिताजी काफी क़र्ज़ में डूबे हुए थे , फिर भी वे मुझे लेने आये थे क्योंकि मैं उनकी लाड़ली थी। माताजी को मेरे गर्भ की स्थिति मालूम थी इसलिए मुझे सफर में भेजना नहीं चाहते थे। उन्हें लगता था की उनका होने वाला पोता कही मेरे मायके जाने की ज़िद्द में दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म न हो जाए।
मुझे उस वक़्त सबको मनाने में बहुत वक़्त लगा। आख़िर कार जब जीवन साथी से फ़ोन पे पूछा गया कि क्या निर्णय लेना होगा भेजने के बारे में तो उन्होंने निःसंकोच कह दिया जैसा उनकी बहू चाहे वही करो। बस फिर ससुरजी ने भी हाँ में हाँ मिलादी। मगर माताजी ने मुझे बेमन रुखसत किया। साथ में एक ज़िम्मेदारी भी दी कि मुझे नायलॉन की रस्सियों से हैंड बैग बनाने होंगे , चारों नंदों के लिए। ऐसे वक़्त में भी वे अपने काम करवाना नहीं भूले।
असल में मेरा वज़न बिलकुल नहीं बढ़ रहा था ,मैं सिर्फ ३५ किलो की थी। सात महीनों में थोड़ा सा भी वज़न नहीं बढ़ा। मुझे लगता था कि अगर माँ के पास रहूंगी तो कुछ सुधार आएगा। मुझे दुलार और सुकून की बहुत ज़रुरत थी। माँ के आँचल में जो राहत मिली वह ऐसे लगता था मनो जन्मों जन्मों की प्यास मिट गयी। जब मैं माँ और पिताजी के साथ रवाना हुई तब मेरे गर्भ का सातवा महीना पूरा होने को था। ३ दिन का रेल का सफर थकान भरा था। आगे मेरी भाभी को भी उनके मायके डिलीवरी के लिए भेजा गया था। फिर मुझे लेजाया गया। उस बात की भी कोई अनोखी मान्यता थी जिसके कारण एक गर्भवती को दुसरी गर्भवती सदस्य के साथ रखना शुभ नहीं मानते थे।
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