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Showing posts from November, 2019

paaras mani

पारस मणि को कभी देखा तो नहीं , हाँ मगर एक पारस तुल्य इंसान को देखकर निःशब्द हो गई। अस्पताल से आने के बाद अगले दिन सुबह बच्ची को पीलिया का इंजेक्शन लगवाना था। बड़े भैया , मैं और दीदी बच्ची को लेकर घर से निकले। ३ मंज़िला इमारत में कोई लिफ्ट की सुविधा नहीं थी। ऑपरेशन के टाकों में दर्द के साथ चढ़ना उतरना पडता था। नीचे गेट पर पहोंच कर मैं भैया की ऐन्टैसर बाइक ढूंड रही थी चलने के लिए , मगर भैया ने रिक्शा बुक कर लिया था। रिक्शा में बैठकर मैंने भैया से कहा पास के ही क्लिनिक में जाने के लिए रिक्शा बुक करने की ज़रुरत नहीं थी। आप अपनी बाइक पे दो बारी में मुझे और दीदी को एक एक करके ले जाते। भैया ने कहा अभी कुछ दिनों तक रिक्शा में जाना सही रहेगा। क्लिनिक पहुंचने के बाद जब बच्ची के कनोला में इंजेक्शन डालने लगे तो भैया से देखा नहीं गया, और वे बाहर जा खड़े हुए। जब फीस देने लगे तो भैया इशारे में डॉक्टर साहब को कुछ कह रहे थे। दीदी मुझे लेकर बाहर आगई। तब तक मैंने दीदी से पुछा की भैया की मोटर साइकिल नहीं दिख रही थी पार्किंग में , कहाँ रखी है उन्होंने। तो दीदी ने बताया शायद सर्विस के लिए दी होगी। ...

shikaayatein.....

तारीफ़ों का दौर कहीं पीछे छूट गया था। अब तो शिकायतों का दौर शुरू हुआ था। अस्पताल में तो लोग बच्ची के रोने की आवाज़ से परेशान थे ही ,धीरे धीरे पड़ोसी और घरवाले भी परेशान होने लगे।  जिस दिन घर पहुंचे थे उसी रात मकान मालिक घर आकर बोले उनकी तबियत ठीक नहीं , बच्ची के रोने के शोर से आराम नहीं कर पा रहे थे।  पिताजी  ने पालने की डोरी को अपने पैर के अँगूठे पर बाँध दिया और सारी रात सोते सोते अपना पैर हिलाते रहे ताकि बच्ची झूलते झूलते सो जाए।  जब पिताजी घंटों ऐसे करते करते थक जाते तो माँ बच्ची को अपने सीने पे उल्टा लिटा कर हिलाती रहती। जब वह थक जाती तो छोटा भाई बच्ची को पालने में सुलाकर ख़ुद ज़मीन पर सो जाता और पालने को नीचे से अपनी हथेली से ऊपर नीचे करता जाता , मानो वह जिम में कसरत करता जा रहा था जब तक वह थक नहीं जाता।  इन सब में दीदी कहाँ पीछे रहने वाली थी , वह भी बच्ची को लेकर पूरे घर में परेड करती, जबकि वह गर्भवती थी। बड़े भैया ने भी अपना योग दान दिया। उन्होंने पालना टीवी के पास रख दिया और टीवी की आवाज़ करके पालने को झुलाते ...

abhyaas adhyayan saamagri

कैसा लगेगा अगर कोई आपको इंसान नहीं बल्कि एक अभ्यास सामग्री के रूप में इस्तेमाल करे ? एक पल के लिए ऐसा हो भी जाए तो हम सहयोग कर सकते है, लेकिन बार बार तो नहीं ना। ऐसी स्थिति हो जाए तो हम बोल कर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर सकते हैं , लेकिन नन्हें शिशु कैसे झेल सकते हैं। बच्ची को केवल दिन भर के लिए ही आई सी यू में रखने लगे, बाकी रात ९ बजे से सुबह ९ बजे तक मेरे पास ही सँभालने को देते। दसवे दिन से एक एक करके अस्पताल के छात्र छात्राएँ बच्ची को देखने आते और उनके सीनियर सोती हुई बच्ची का सिर हथेली में उठाते और एक ऊँचाई से छोड़ देते , यह सुनिश्चित करने कि बच्ची दिमागी तौर पर ठीक है या नहीं। बच्ची डर कर ज़ोर से रोने लगती , फिर भी एक छात्र बच्ची के फेफड़ों की आवाज़ सुनता , एक वज़न तौलता , तो एक सिर का माप और लम्बाई नापता। बिचारि छोटी सी जान , सभी के अभ्यास अध्ययन की सामग्री बन गई थी। मुझसे तो यह सब देखा नहीं जा रहा था। एक तो पूरी रात जागरण करो बच्ची को संभालने में फिर सुबह वह सोने लगे तो छात्रों की भीड़ उमड़ कर   सारी शान्ति भंग कर देते। पहले से ही बच्ची को यातनाएँ...

kadhva swar

कढ़वा स्वर , यह सबने पहली बार सुना और महसूस किया था। रोते तो सभी बच्चे हैं, लेकिन बिलकुल हट कर तीखी ध्वनि शायद ही किसी ने सुनी हो। एक हफ्ता हो चुका था आई सी यू में , लेकिन जबसे बच्ची ने ढ़ंग से स्थन पान करना शुरू किया , तबसे आधी रात में बहुत ही कढ़वी आवाज़ में रोने लगी। नर्स सब परेशान हो गयी , इंजेक्शन से पाउडर का दूध पिलाने पर भी चुप नहीं होती थी। पूरी रात उन्होंने बच्ची को संभालने में बितायी ताकि बाकी बच्चों की नींद न उड़ जाए। जब आठवे दिन बच्ची को दूध पिलाने गयी तो नर्स ने सारा हाल सुनाया। अभी हमको अंदाज़ा नहीं था कि कैसी आवाज़ में रोने की बात कर रही थी नर्स । उस रात फिर वही रोना शुरू हुआ और नर्स हार कर बच्ची को मेरे पास ले आयी। माँ ने सब तरीके से बच्ची की जाँच करके देखा ,कोई संकेत नहीं मिल रहा था। न पेट फूला हुआ था , न भूक सता रही थी , न कोई और वजह समझ आ रही थी। पहले मैं कम से कम रात को तो चैन से सोती थी , अब वह भी नसीब में नहीं रहा। बच्ची इतनी ऊँची आवाज़ में रो रही थी मानो कोई उसको बेरहमी से पीट रहा हो और वह दर्द से चीक रही हो। रोज़ रात को ढ़ाई बजे रोना शुरू होता...

adhmari zindagi

पैरों तले ज़मीन खिसकना सुना था , मगर कमरे के बाहर रखी व्हील चेयर का गायब हो जाना पहली बार देखा था। एक तो टाकों में दर्द, बिना व्हील चेयर के चलना और लौटने का रास्ता भी भूल गयी। कोई रिश्तेदार भी साथ नहीं थे उस वक़्त। अपनी फटी किस्मत पर रोना आ रहा था। धीरे धीरे दीवार के सहारे चलते चलते, लोगों से पूछकर, अपने वार्ड तक पहुंच गयी। उन दिनों मोबाइल बहुत कम होते थे , एक परिवार में केवल एक फ़ोन, वह भी सिर्फ घर के मुख्या के पास, तो किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पायी। पिताजी ने मेरी हालत देख कर तुरंत अस्पताल के व्यवस्था अध्यक्ष से भेट की , लेकिन किस्मत में एक भी व्हील चेयर हाथ नहीं लगी।  सारी चेयर्स काफी मरीज़ों के लिए व्यस्त थी।  प्रशासन ने माफ़ी माँगते हुए एडजस्ट करने को कहा। पिताजी निराश लौट आये। कुछ ही देर में फिर बच्ची को दूध पिलाने बुलवाया। नर्स ने बताया हर दो घंटे में दूध पिलाने जाना होगा। यह सुनकर मेरे सर पर जैसे पहाड़ गिर पड़ा, क्योंकि वार्ड से आई सी यू तक का फ़ासला कम से कम ८००-९०० मीटर था , वह भी बिना व्हील चेयर के आना जाना बहुत भारी था। एक घंटा...

madad ki guhaar

हर कोई यही सोचता है कि दुःख के बादल एक दिन छट जाएँगे , लेकिन कब तक , यह कोई नहीं सोचता। मेरी तकलीफों का सिलसिला कब तक चलने वाला था इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता था।  चौथे दिन से बच्ची को स्थन पान कराने के लिए आई सी यू के बगल वाले फीडिंग रूम में बुलवाया गया। वहाँ नर्स ने चेतना, चेतना आवाज़ लगायी। बच्ची के पैर पर लेबल लगाया हुआ था जिस पर चेतना लिखा हुआ था। मैंने कहा यह तो मेरा नाम है, बच्ची का नहीं। नर्स ने बताया कि सभी शिशुओं को उनकी माँ के नामों से ही पहचाना  जाता हैं। बाकी सभी शिशुओं को नर्स ने दो हाथों के सहारे पकड़कर उनकी माता को दिया , लेकिन जब मेरी बच्ची की बारी आयी तो नर्स केवल एक हथेली पर पेट के बल लिटा कर देने आयी।  मैं तो हैरान होगयी इतनी छोटी सी बच्ची को देख कर। डिलीवरी के बाद जब कुछ क्षण के लिए पहली बार उसे देखा था तो अंदाज़ा नहीं था कि साधारण तौर पर शिशु थोड़े उससे बड़े होते हैं , करीब ढ़ाई तीन किलो के। लेकिन मेरी बच्ची तो केवल सवा किलो की थी। मैंने नर्स से कहा ऐसे कैसे इतने छोटे बच्चे को चिकन की तरह लटका कर लाए हो, कुछ हो जाता तो बच्ची क...

bhool bhulaiyya

प्राचीन चिकित्सालय साधारण एक मंजिला इमारत होते थे। अगर उनको अपनी सेवाएँ बढ़ानी होती थी तो अगल बगल और कमरें बनवाते जाते , मगर कभी ऊपरी मंजिल का निर्माण नहीं करते थे। मेरे लिए ऐसा अस्पताल एक भूल भुलैय्या के जैसा प्रतीत हो रहा था। एक विशाल प्रवेश द्वार के अंदर एक और द्वार , उसके अंदर एक और द्वार, उसके भी अंदर एक और द्वार, सिलसिला ज़ारी था। ऐसा प्रतीत हो रहा था , मानो किसी रेल गाडी के बोघी के अंदर चले जा रहे हो। जिस कमरे में काम हो वहाँ रुक जाओ। जगह तो काफ़ी खुली खुली थी , मगर ढंग के साइन बोर्ड न होने के कारण बहुत उलझन होती थी। हँसी तो बहुत आती थी उस भूल भुलैया में आने जाने में , लेकिन ठीक से हँस भी नहीं पाती थी ऑपरेशन के टाकों में दर्द की वजह से। मुझे उस अस्पताल के एक जनरल वार्ड में भर्ती कराया गया, क्योंकि बच्ची को आई सी यू में  रखा हुआ था। परिवार के किसी भी सदस्य ने दुबारा बच्ची को देखा नहीं था। दो दिन तक बच्ची को तेज़ किरणों के प्रभाव में रखा था। तीसरे दिन से एक छोटी सी स्टील कि डिबिया में माँ का दूध मंगवाती थी नर्स। बहुत ही दर्दनाक हालत थी ...

mata pita ka karz

यह सच है कि ख़ुदा के बाद माता पिता का दर्जा पूजनीय होता है। यह मैंने तब महसूस किया जब घर के सभी लोग बच्चों के ख़ास अस्पताल में थे और पिताजी और मैं नर्सिंग होम में थे। मेरी डिलीवरी का खर्चा १५००० रुपए था जो डॉक्टर साहिबा ने पुरानी जान पहचान की वजह से कम कीमत लगायी थी , लेकिन पिताजी ने सोचा था कि नॉर्मल डिलीवरी होगी तो सिर्फ ५००० रुपए ही देने होंगे। मगर बिल उनके आसक्ति के हिसाब से तीन गुना अधिक था, और वे केवल १०००० रुपए जुटा पाए थे। उस दिन मैं डॉक्टर से रख रखाव के बारे में पूछने जा रही थी कि मैंने देखा पिताजी डॉक्टर साहिबा के चरणों में बैठे बिनती कर रहे थे कि उनसे जितना बन पड़ा उतना कर दिया , बाकी माफ़ कर दे। मुझे लगा भला डॉक्टर लोग डिस्कॉउंट देने के बाद भी कभी और अधिक छूट देते हैं ? शायद मुझे अस्पताल में ही रखेंगे जब तक पूरा बिल न चुका दे। लेकिन डॉक्टर साहिबा ने पिताजी की आँखें सच्चाईयी से भरी नम देखी तो उन्हे उठाया और कहा कोई बात नहीं अगर उनकी फीस न मिले, केवल टीम की फीस और बाकी चीज़ों का खर्चा चुका दे। यह देख कर मेरा दिल भर आया। पिताजी की सीख याद आ रही थी कि भले लोग...