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Showing posts from October, 2019

sanjeevani davaaiyan

सुना था कि भगवान उसी की परीक्षा लेते रहते है जो सक्षम होता है। लेकिन मैंने माँ , पिताजी, भैया और दीदी को भी मेरे साथ साथ परीक्षा देते हुए देखा था। बहुत उब चुके थे ज़िन्दगी से सब ,पता नहीं कब ख़त्म होगा उतार चढ़ाव का खेल। डॉक्टर साहिबा ने एक लम्बी सी पर्ची दी दवाइयाँ लाने के लिए , मगर पिताजी ने सोचा एक दो दिन में पैसों का इंतजाम हो जाएगा तब इकहट्टी ले आयेंगे दवाई। रात भर दर्द से रोती रही जैसे कोई हाथी के पैरों से रौंदी गयी हो। न मुझे पता था ना घरवालों को कि उस सूची में एक दर्द सुन्न करने की दवाई भी थी जो डॉक्टर साहिबा ने पहले लाने को कहा था। घर में किसी को भी पहले किसी बड़े ऑपरेशन का अनुभव नहीं था तो तकलीफ़ सहन करनी पड़ी, क्यों की उन दिनों मेडिकल स्टोर रात भर नहीं खुले रहते थे। एक भली नर्स ने मुझे नींद का इंजेक्शन लगा दिया और मैं सो गयी। अगले दिन सुबह दर्द भयंकर हो गया। पिताजी दौड़े दवाई लाने , मगर दुकान देर से खुलती थीं। दोपहर के बारह बजे तक सारी दवाईयाँ ले आये और हर पल मेरे पास ही बैठे रहे। भैया बच्ची के कागज़ी काम में लगे हुए थे। माँ और दीदी बच्...

kaal chakra

सुबह के ठीक १० बजे एक पल का मौन हुआ फिर मेरी आँखों पर एक कपडा डाल दिया गया। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था , लेकिन आवाज़ सुनाई दे रही थी "अरे बच्चा रो नहीं रहा , जल्दी करो , मारो मारो" मन को धक्का लगा मनो दुनिया ख़त्म हो गयी हो , इतने में ज़ोर से मारने की आवाज़ आयी। मौन को चीरती हुई पहली किलकारी ऐसे प्रतीत हो रही थी मानो कितने कर्मों का दण्ड भोगने इस धरती पर आना पड़ा हो। बच्चे की आवाज़ सुनकर फिर मैं बेहोश हो गयी। शाम के ४ बजे होश आया तो देखा आस पास पूरा परिवार है , लेकिन बच्चा नहीं। मैंने पापा से पूछा दूर के चाचाजी जो मेरे सगे नन्दोई लगते है , उनको अभी ही क्यों बुलाया अस्पताल। पिताजी ने बताया कि सिर्फ उन्हीं का ब्लड ग्रुप मेरे ब्लड ग्रुप से मैच हुआ , इसलिए तुरंत मेरी मदद के लिए आ गए। यह जान कर बहुत ख़ुशी हुई। उनको  बहुत धन्यवाद किया। एक मेरे मौसाजी भी थे वहाँ जो कई सालों से हमारे घर आते नहीं थे। मेरे बचपन के मोह ने उनको भी मजबूर कर दिया एक आखरी बार मुझे एक नज़र देखने को। बस मुझे होश में आता हुआ देख वहाँ से चल दिए। मैंने दीदी को बुलाकर पूछा...

dimaagi khalal

उन दिनों ऑपरेशन सिर्फ़ किसी ख़ास वजह से ही हुआ करता था , अधिकतर सभी डिलीवरी साधारण कुदरती तौर पे ही होती थीं। इसलिए कई लोगों को यह भी नहीं पता था कि ऑपरेशन को सिज़ेरियन भी कहते है। लोग ऑपरेशन का होना बहुत बड़ी बात मानते थे, इसलिए मेरा पूरा परिवार गहरी चिंता में था और मैं डॉक्टरों की बातें सुनकर डॉक्टरी के नए शब्द सीख रही थी। जी हाँ , मैंने भी सिज़ेरियन शब्द पहली बार ही सुना था , और ऑपरेशन के वक़्त सोच रही थी कि इतिहास के एक पाठ में जूलियस सीज़र के बारे में पढ़ा था , लेकिन यह सब ऑपरेशन को सिज़ेरियन क्यों कह रहे हैं , इसके बारे में कभी नहीं पढ़ा। उतने में डॉक्टर साहिबा ने मुझसे पूछा "चेतना , चेतना , मेरी आवाज़ सुन रही हो , बात करो मुझसे।" मैंने कहा हाँ सुन पा रही हूँ , और हैरत में पड़ गई , यह क्या मैं तो बेहोश हुई ही नहीं , लेकिन जब थाइरोइड का ऑपरेशन हुआ था तब तो मैं बेहोश थी कई घंटे। अब एक पल के लिए घबराहट हुई कि पेट काटेंगे तो दर्द होगा तो क्या करूँगी।   डॉक्टर साहिबा ने फिर कहा पैर हिला के देखो , कुछ महसूस हो रहा है क्या? , मैंने कहा नहीं। बड़ी गुदगु...

maut ka farmaan

बाहरी हलचल से बेखबर मैं ऑपरेशन के लिए तैयार हो गई। बहुत देर से मैंने माँ और पिताजी को देखा नहीं था, बस डॉक्टर साहिबा की आवाज़ सुनाई दे रही थी कि जल्द से जल्द ब्लड़ डोनर का इंतज़ाम कीजिए। माँ की हल्की हल्की आवाज़ आ रही थी कि इतने महीने बेटी ने दुःख देखा है, बच तो जाएंगे न..... मैं सोचने लगी कि माँ ऐसे क्यों बात कर रही है, पता नहीं क्या चल रहा है बाहर। मैं पूछना चाहती थी सब मगर कोई नर्स भी मेरे पास नहीं थी , इतने में डॉक्टर साहिबा आ गई। उन्होने ने मुझे एक कागज़ पर दस्तख़त करने को कहा यह बता कर कि मेरा पेट पूरी तरह से सिकुड़ गया है और खून भी काफी बह गया है तो किसी एक जान को बचाने की कोशिश कर सकते है। मेरी राय मांगी कि बच्चे को या मुझे बचाना है , और मैंने तुरंत कहा बच्चे को बचालो, मुझे तो वैसे भी नहीं जीना। मैंने बहुत ख़ुशी से अपने मौत के फरमान पर दस्तख़त कर दिया। डॉक्टर साहिबा ने कहा देखते हैं क्या होता है और जल्दी जल्दी और डॉक्टरों को मेरी स्थिति बताई। सारे टीम वाले हैरान होकर बोले ऐसा तो पहला केस देखा है उनके जीवन में और सबने भगवान को प्रार्थना करके ऑपरेशन शु...

rookhe ko bhi hasna sikha diya

क्या ज़माना था , उन दिनों डॉक्टर सिर्फ मरीज़ की सेवा का उद्देश्य रखते थे, मगर इस नए दौर में चंद ही ऐसे डॉक्टर है कहीं कहीं। डॉक्टर साहिबा ने मुझे एक और नर्स को सौंप दिया और खुद शिशु विशेषज्ञ को तुरंत आने को कहा , साथ ही बाकी टीम को भी बुलवाया। नर्स ने मुझे पहली मंजिल पर चलने को कहा , तो मैंने नादानी में कहा कोई बात नहीं मैं नीचे इंतज़ार करती हूँ आपका , आप ज़रूरी सामान नीचे ले आओ , ख़ामख़ा सारा अस्पताल गन्दा हो जायेगा। नर्स भड़क गयी, बस जल्दी चलने का हुक्म दिया। पता नहीं क्यों उस दिन बड़ी निश्चिन्त थी, जहाँ सब लोग हड़बड़ी मचा रहे थे , वहाँ मैं आराम से बातों में पड़ी थी , कोई तेज़ी नहीं दिखा रही थी। मुझे लग रहा था कि निश्चिन्त रहने से शायद बी.पी कम हो जाएगा, और एक फूले पेट से भी जल्द ही छुटकारा मिल जाएगा क्योंकि मैं सोचती थी कि गर्भावस्था में ८ महीनों तक दो ज़िन्दगी का ध्यान अकेले रखना पड़ा वह भी बड़ी नाज़ुकी से ,  बच्चे के जनम के बाद एक ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाऊँगी। परिवार के लोग तो संभाल ही लेंगे बच्चे को, तो मैं जैसे चाहे वैसे बैठ उठ सकती हूँ बादमें। आज यह सब याद करके हंसी आती ...

baaton ki ladi

कभी ऐसा व्यक्ति देखा है किसी ने जो मुश्किल घडी में उत्सुक बच्चे की तरह हर चीज के बारे में पूछे यह क्या है, वो क्या है..... शायद कोई हो भी कहीं , एक मैं भी थी। क्योंकि मेरे साथ उस वक़्त घर का कोई व्यक्ति नहीं था, तो मैं नर्स से हर बात के लिए सवाल कर रही थी। जब तक डॉक्टर जाग कर नीचे आते, तब तक नर्स मुझे एक कमरे में ले गयी और बेड पे लेटने को कहा। वह बेड अजीब था, छोटा सा , थोड़ा गोल कटा हुआ , तो मैंने पुछा यह तो टूटा हुआ है और छोटा भी, मैं कैसे सोऊँ इस पर। नर्स ने मुझे विनम्रता से बताया कि वह बेड ऐसा ही होता है ताकि डॉक्टर आसानी से जाँच कर सके। फिर मैंने एक और सवाल किया कि अगर मैं इस पर लेट गयी तो सब गन्दा हो जाएगा , आपको साफ़ करने की परेशानी होगी। तो नर्स थोड़ा मुस्काई और कहा तुम उसकी चिंता मत करो, बस लेट जाओ। उनकी बात मानली और जैसे ही लेटी पहले ही माफ़ी माँगली , मेरी वजह से हुई वहाँ गंदगी के लिए। फिर मैंने पुछा डॉक्टर अपने घर क्यों नहीं गयी , उनके परिवार वाले नाराज़ होंगे उनसे कि अभी भी वे मेरी वजह से अस्पताल में ही है। अब नर्स थोड़ी परेशान हो रही थी मेरी बातों से , तो उन्होंने...

honi anhoni...

 किस्मत भी क्या क्या खेल दिखाती है।चाहे कितना भी गीता का पाठ पढ़ा हो, कितनी ही पूजा अर्चना करली हो, फिर भी होना वही होता है जो किस्मत में लिखा होता है। दीदी से मिलने के बाद अगले दिन कहीं बहार खाना खाने जाने का तय किया था। वैसे तो मेरा आठवां महीना शुरू होक १० दिन हुए थे , और डॉक्टर ने भी एक महीने बाद की डिलीवरी की तारिक बताई थी। इसलिए सुबह जल्दी नहाने चली गयी। अब मुझे तो कुछ पता नहीं था कि डिलीवरी के पहले क्या लक्षण होते हैं , और ना ही माँ ने कभी ज़िक्र किया, न ही डॉक्टर कुछ इसके बारे में बताया कभी। मुझे कोई दर्द भी नहीं उठा था। बस नहाते वक़्त, नल के पानी के बहाव की तरह ख़ून का बहाव शुरू हो गया था। यह देखकर मुझे कोई घबराहट नहीं हुई थी यह सोच कर कि शायद आखरी महीने में ऐसा ही होता होगा। मगर थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही थी तो माँ को बुलाया।  माँ तो देखते ही बावली सी हो गयी , पूरे घर के लोगों को हिला दिया , सबको कोई न कोई काम बताया। मुझसे बार बार मिन्नतें कर रही थी कि जिस हालत में मैं हूँ वैसे ही बाथरूम से बाहर निकल आऊँ। मगर मैं नही...

pyar ka khazana

 स्टेशन पर दोनों भाई मुझे लेने पहुंच गए थे जैसे कोई मुख्य अतिथि को लेने आये हो। ऐसा लगना वाजिब भी था क्योंकि छोटे भाई के जनम के बाद घर में सालों बाद किलकारी गूँजने वाली थी। ज़्यादातर सभी लोगों को नन्हे बच्चे बहुत प्रिय लगते हैं। ख़ास करके मेरे बड़े भैया को तो बच्चियों से बहुत लगाव है , इसलिए वे दुआ करते थे कि उनकी संतान एक बेटी हो।  घर पहुंच कर सबने बहुत सारी यादें ताज़ा की। माँ के हाथ का खाना खाके बेहद संतुष्टि हुई। रोज़ शाम को ,बारी बारी से पिताजी और बड़े भैया व  छोटा भाई , मेरे पैरों की मालिश किया करते थे। मेरी सूजन को देखकर उनको मेरी चिंता अधिक होने लगी। जाँच करवाने पर पता चला कि बी.पी अधिक बढ़ा हुआ था। इसको नियंत्रित करने के लिए दवाई ली।  वे दिन ज़िन्दगी के बेहद खुशनुमा दिन थे , ऐसा लगता था जैसे एक अर्सा बीत गया हो आराम किये , जो मायके में सारी तमन्नाएँ पूरी हो गयी। मेरा वज़न ४ किलो बढ़ गया था केवल एक ही हफ्ते में। लेकिन मेरी किस्मत कभी आसान सफर पर नहीं ले जाती। आगे की कल्पना किसीने नहीं की थी। तब तक दीदी का फ़ोन आया कि वह भी माँ बनने वाली थी। उ...

dil toh bachha hai

बंधन कई प्रकार के होते हैं , उनमें से सबसे अनमोल है माँ की ममता। मेरी गोद भराई का कार्यक्रम रखा गया। मेरे माता पिता को भी बुलवाया गया। जिस तरह कोई नन्हा बालक पहली बार पाठशाला से घर आते ही माँ और बाबा से लिपट जाता है , उसी प्रकार मैं भी बहुत महीनों बाद माँ को देखकर गले लग गयी जिससे कलेजे में ठंडक पड़गई। उन दिनों पहली डिलीवरी के लिए मायके जाने का रिवाज़ था। इस अधिकार को भी बड़ी मुश्किल से पाया था मैंने। ससुरजी को मेरे पिताजी के काम धंदे की परेशानियों का अंदाज़ा था , इसलिए वे नहीं चाहते थे की मेरा खर्चा मेरे पिताजी का बोझ बढ़ादे। पिताजी काफी क़र्ज़ में डूबे हुए थे , फिर भी वे मुझे लेने आये थे क्योंकि मैं उनकी लाड़ली थी। माताजी को मेरे गर्भ की स्थिति मालूम थी इसलिए मुझे सफर में भेजना नहीं चाहते थे। उन्हें लगता था की उनका होने वाला पोता कही मेरे मायके जाने की ज़िद्द में दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म न हो जाए। मुझे उस वक़्त सबको मनाने में बहुत वक़्त लगा। आख़िर कार जब जीवन साथी से फ़ोन पे पूछा गया कि क्या निर्णय लेना होगा भेजने के बारे में तो उन्होंने निःसंकोच कह दि...

toph mein barood

मुसीबत जब आती है तो चारों ओर से आती है। माताजी को लगा घर का काम कर नहीं सकती तो बैठे बैठे ५ साड़ियाों में कुंदन लगा सकती है। वे अपनी बेटियों को भेठ देना चाहती थी। भविष्य के खतरे से अंजान मैंने वह काम शुरू कर दिया। तकलीफ तो हो रही थी घंटों बैठे रहने में, एक एक नग बराबर की दूरी पर लगाने के लिए झुकना भी पड़ रहा था, वो भी प्रेस को ज़ोर से दबाकर चिपकाने पड़ रहें थें । एक दो बार माताजी को बताया कि तकलीफ होती है उस काम में , तो उन्होंने मुझे मेरी बहन के घर जाने को कहा। मन की मुराद पूरी हो रही थी। शादी के बाद पहली बार उनसे मिलने जा रही थी। ख़ुशी में अपने दुःख दर्द सब भूल रही थी। लेकिन माताजी ने कहा बस कुछ घंटों के लिए जाना है और वे साड़ियों का काम वहाँ पूरा करना है। यह तो वही बात हो गई कि चाहे इधर मारो या उधर, मरना तो निश्चित है। फिर भी सोचा कम से कम दीदी और जीजाजी से मिलना हो जाएगा।  मगर वहां पहुंच कर मेरे काम की वजह से किसी से भी ठीक से बात ना कर सकी। माताजी बार बार फ़ोन करके घर जल्दी आने को कहते रहे सो दीदी के परिवार वाले मुझे घर पहुंचा गए। जब मेरा जनम दिन आया तो ससुरा...

jeevan maran ka daav

सर्दियों के दिन शुरू हो गए थे। वह मेरी पहली सर्दी थी इसलिए ज़्यादा अनुभव नहीं था कि पहन ने ओढ़ने के लिया क्या व्यवस्था होनी चाहिए। मैं तो दक्षिण भारत से थी जहाँ बारहों महीने एक जैसा मौसम था , ना अधिक गर्मी और ना ही कड़ी ठंडी , बस हल्की बारिश रोज़। एक तो गर्भवती होने के कारण असक्ति और बेचैनी थी ऊपर से सर्दी बर्दास्त नहीं हो रही थी। जीवन में पहली बार कोहरा , उम्मस , हीटर , कूलर आदि देखें थें। गर्मी और सर्दी से बचाव के तरीके भी नहीं आते थे। हालत बहुत बिगड़ती जा रही थी। कुछ महीनों बाद माताजी ने पूछा कि उनके आने की ज़रुरत है क्या , तो हमने मना कर दिया कि कोई दिक्कत नहीं है। असल में माताजी को घुटने की तकलीफ थी, तो घर के भीतर प्रवेश द्वार से कमरे तक जाने के लिए हर रोज़ सीढ़ियां चढ़नी उतरनी पड़ती थी वह भी कई कई बार , जिससे माताजी को बहुत तकलीफ हुई थी , और बिस्तर की भी कमी थी , ऊपर से वह मकान बस एक शेड और दीवारों से बना था जहाँ धूप बिलकुल भी नहीं आती थी। ऐसे में माताजी को और तकलीफ ना हो जाए यह सोच कर अपनी परेशानियाँ ख़ुद सँभालना सही समझा। मेरा छठा महीना लग गया था। ठंड से पेट अकड़ गया था। शुरुवाती दिनो...

har sutra har vyakti ke liye sahi nahi hota

 कभी कभी हर सूत्र हर एक व्यक्ति पर लागू नहीं होता , मगर बड़े बुजुर्ग अधिक अनुभवी होते हुए भी गलती कर बैठते हैं। मेरी आगे की कहानी भी कुछ ऐसे सूत्र का शिकार थी।  माताजी मुझे अपने साथ गाँव ले गयी थी। मुझे लगा था कि जिस तरह शादी से पहले माँ और पिताजी मुझे उल्टी होने पर मेरी देख भाल करते थे , ठीक वैसे ही माताजी भी मेरा ध्यान रखेंगी। मगर मेरी सारी उम्मीदें व्यर्थ थीं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टा बुजुर्ग होने के नाते उन्होंने मुझे अपने अनुभवों की बलि चढ़ा दिया, जो आगे जाकर मेरे जीवन  को लाचार बनाकर रख दिया।  माताजी को लगता था की अधिक से अधिक काम करते रहने से डिलीवरी आसान होगी और बच्चा भी तंदरूस्त होगा। इसलिए दिवाली के लिए रसोई की सफाई दो महीने पहले ही शुरू करदी , यह सोचकर कि जब तक मैं वहाँ हूँ तब तक सारा घर साफ़ करा दूँ। सुबह से शाम तक बाथरूम में बर्तन मांजते मांजते जब उल्टी आ जाती तो लाड लड़ाने के बदले डाँटते कि यह तो दुनिया की सभी औरतों को होता ही है , इसमें कोई नयी बात नहीं। यह सुनकर जी भर आता था। जब खाना खाने को मिलता था तो माँ की बह...

asamanjas ke pal

जब मैं ५ वर्ष की थी तभी से ही मायके में कपडे धोने की वॉशिंग मशीन देखी और बड़े होते होते इस्तेमाल  करने की आदत लग चुकी थी। इसलिए जब पहली बार कम्बल, चादर हाथ से धोने की कोशिश की तो कुछ समझ ही नहीं आया कि कैसे धोना है। नल के पानी के संग आंसुओं की धारा भी बाल्टी में भर रही थी। पिताजी की कही बातें याद आ रही थी कि लड़कियों को घर ही संभालना है ज़िन्दगी भर, तो ज़्यादा पढ़ के क्या करेगी। उस वक़्त सच में मेरी पढ़ाई कुछ काम नहीं आ रही थी। प्रभु से एक वरदान माँग रही थी कि एक वाशिंग मशीन दिलादो बस, बाकी काम जैसे प्रभु की मर्ज़ी हो वैसे कर लूंगी। दिन गुजरने लगे, और सर्दियों के दिन शुरू हो गये। माताजी अपने गाँव लौट गए। जीवन साथी अपनी नौकरी में व्यस्त रहने लगे। अकेले घर में मेरा मन नहीं लगता था। कोई पडोसी नहीं था जिनसे बात कर सकती थी क्योंकि मकान एक मज़दूरों के इलाके में था। मेरी तबीयत  बिगड़ने लगी थी। माँ की बहुत याद आने लगी थी। माताजी को गाँव से बुलवाया और जाँच करवाई तो पता चला कि मैं गर्भवती थी। जिसकी भी ज़िन्दगी में यह पल आता है तो वे ख़ुशी के मारे फूले नहीं समाते हैं। मगर मैं बड़ी चिंत...

jeevan ka asli safar

रेल गाडी का सफर जैसे ज़िन्दगी का सफर दर्शा रहा था। मुझे एक नयी मंज़िल पर ले जा रहा था। अब सफर सुखद होगा या दुःखद यह तो वक़्त आगे बताने वाला था। जीवन साथी के संग रेल गाडी का सफर बहुत आसानी से कट गया, अब असल जीवन के सफर की शुरुवात की बारी थी। ससुराल पहुंच कर वहाँ से माताजी के संग जीवन साथी के घर आँगन में प्रवेश किया जो लखनऊ में था। वह एक कार गराज था, मकान मालिक के कोठी के पीछे। बहुत ही विचित्र माकन था। नीचे तले पर मुख्य द्वार था हाल में जहाँ एक व्यक्ति के सोने के जितनी भी जगह नहीं थी। फिर ऊपर की तरफ बड़ी बड़ी खुली सीढ़ियां थीं। उसी सीढ़ी के बीच में छोटी सी रसोई थी, २ कदम पर एक ही कमरा था। इतने छोटे घर में कभी रही नहीं थी तो थोड़ा अटपटा लग रहा था। वहॉं की बोली बहुत ही मधुर थी मगर समझने में थोड़ी सी कठिन थी। लोगों का दिल और स्वभाव भी नम्र था। एक बार तो गेहूँ पिसवाने पैदल गयी थी तो एक साइकिल रिक्शा वाले ने कहा , "बिटिया तनिक किनारे होइ जाओ " यह वाक्य इतनी तेज़ी से कहा कि मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। मुझे लगा कि कुछ डाँट के गए होंगे । आस पास के लोगों से पूछने पे पता चला कि ज़रा सड़क...

rishton mein badlaav

पहली राखी हर शादी शुदा लड़की के जीवन में बेहद ख़ुशी लेकर आती है। त्यौहार वही सदियों पुराना था लेकिन एहसास नया था, रीती रिवाज़ नए थे , सौगात नयी थी, हर एक रिश्ते की अहमियत तब समझ में आयी थी। जिनके साथ खेल कर , झगड़ कर, रूठ कर, मना कर और हँसते रोते बड़े हुए थे, उनको बड़े सम्मान से देखने लगे। मन प्रफुल्लित हो उठा, फिर से अपनी गलियों चौबारों में लौट कर। भले ही वह ख़ुशी कुछ ही दिनों की थी, फिर भी सुकून था कैद से छूटने का। शादी से पहले १० कामों के लिए माँ भगाया करती थी, अब माँ कहती थी बैठ जाओ बेटा घर के बाकी लोग काम करलेंगे। अनोखा बदलाव था सभी के प्यार जताने में। मैं भी जैसे फिर से बच्ची बन गयी थी। जिस तरह बचपन में स्कूल से लौट कर दिन भर की सारी बात माँ को बताती थी , उसी तरह ससुराल की सारी बात सबसे बताई। अंजाम से अनजान , भोलेपन में न जाने कौनसी मुसीबत को न्योता दे दिया था। माँ, पिताजी और बड़े भैया को मेरी सासुमा पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मेरी बड़ी भाभी ने भी मेरी बताई बातों को बढ़ा चढ़ा कर मेरी चाची को बताई जो मेरी नन्द भी थी। बातें सासुमा तक पहुँची। मेरी सुनवाही बाकी थी। मु...

adhoora azaad Bharat

पता नहीं क्यों शादी के बाद शुरुआत से ही दुल्हन पर नयी सास इतना दबदबा बनाके रखते हैं जैसे कोई निर्जीव कट्पुतली घर लायी हो। जैसे मन चाहा वैसे नचा लिया। अगर बहू ९९ काम अच्छे करती हो और एक काम गलत हो जाए तो सारे किये कराये पे पानी फिर जाता । वह एक गलती इतनी बड़ी नज़र आती कि बाकी ९९ अच्छायियां नज़र ही नहीं आती। इसलिए मैंने मन ही मन मान लिया था कि   "लाख़ खुशियाँ सही एक घम भुलाने के लिए, एक घम ही काफ़ी है ज़िन्दगी भर रुलाने के लिए। " लेकिन अब १६ सालों बाद यह बात बदल गयी कि "लाख़ घम सही एक ख़ुशी रोकने के लिए, अब तो एक ख़ुशी ही काफ़ी है ज़िन्दगी बिताने के लिए। गाँव में किसी के घर मिलने जाना होता तो रात को माताजी बता देते कि अगले दिन सुबह क्या खाना बनाना है। मैं बिलकुल वैसा कर देती थी यह सोच कर कि माताजी बहुत खुश होकर तारीफ़ करेंगे। लेकिन वे क्रोध करते कि अभी ज़िंदा बैठे है तो पूछ कर काम करने का संस्कार नहीं है। घर की चाबी सँभालने को देकर रास्ते में भरोसा नहीं कहकर दुबारा ले लेते थे वह भी बेइज़्ज़त्ती करके, अजीब सी शर्मिंदगी का एहस...

ek desh ek bhaasha

दुनिया में विभिन्न देशों में अलग अलग भाषाएँ बोली जाती हैं। भारत एक लौता देश है जहाँ विभिन्न प्रान्तों में भी अलग अलग भाषाएँ बोली जाती हैं। मुझे कुछ राज्यों की भाषा सीखने का बहुत शौक था तो अपने दोस्तों से स्कूल व कॉलेज में गुजरती, बंगाली, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम और पंजाबी सीखी। विभिन्न भाषाएँ बोलने का एक अपना आनंद था। लेकिन शादी के बाद जब ससुराल में शुद्ध देसी राजस्थानी सुनी तो चक्रा गई। मुझसे बारी मंगवाई गयी और में खिड़की के पास खड़ी हो गयी कि कैसे ले जाना है। भाषा में अंतर की वजह से समझने में अंतर आ रहा था। मैंने पहले कभी ऐसी भाषा न सुनी और न कभी बोली थी। बहुत देर के बाद जब डाँट पड़ी तो मैंने माफ़ी माँगी कि समझ नहीं आया कि बारी यानी खिड़की होता है या और कुछ। तब जाके माताजी ने कहा कि झाड़ू को कहते है। अगले दिन फिर डेचकी गैस पर रखने को कहा , मैं सोच रही थी कि बर्तन पकड़ने के टूल को कहते होंगे , लेकिन जब पूछा तो पता चला कि गरम पानी करने के पीतीले को कहते है। ससुरजी ने टेमल माँगा तो मैंने स्टूल उठा के दे दिया, फिर उन्होंने खुद जाकर अपनी लुंगी ...