andh vishwas
हिंदुस्तान में एक भी शादी ऐसी न होगी जिसमें रिश्तेदारों का रूठना मनाना न हुआ हो। पिताजी अपने परिवार में बड़े थे और माँ भी अपने घर की बड़ी थी। मेहमान लोग दूर दूर से आये थे। आतिथ्य सत्कार में कोई कमी नहीं थी, फिर भी करीबी रिश्तेदार मन मोटाव के कारण ख़ुशी में शामिल नहीं हो रहे थे। बड़े होने के बावजूद माँ और पिताजी को अपने सगे सम्बन्धियों को हाथ जोड़ कर विवाह स्थल पर बुलाना पड़ा। पिताजी सिर्फ यह चाहते थे कि बेटियों की नयी ज़िन्दगी की शुरुवात में कोई उदासी भरा माहौल न बनजाये।
बड़ी दीदी की तबियत एकाएक खराब हो गयी , सो मुझे दीदी को हर रस्म पर संभालना पड रहा था। हम दोनों बहनों की शादी एक ही मंडप में आयोजित की गयी थी, लेकिन दक्षिण भारत से आये मेहमानोने बताया कि अगर दो बहनों की शादी एक ही मंडप में होगी तो एक के नसीब में सिर्फ दुःख होगा और दूसरी के नसीब में सिर्फ खुशियाँ। यह सुनते ही माँ बहुत सहम गयी। अभी सोच ही रही थी कि आगे क्या और कैसे करना है उतने में बारातें पहुंच गयी थीं।
परिवार के सभी लोग बरात के स्वागत में इतने मग्न हो गए थे कि किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि हम दोनों बहनें घर पर भूखे थीं। फेरों का वक़्त होने लगा तो माँ को याद आया कि अगर वो बात सच हुई तो बेटियों की ज़िन्दगी बिगड़ जायेगी। इसलिए आनन् फ़ानन में ऊपरी मंजिल पर दूसरा मंडप लगवाया। कम समय में एक और पंडितजी बड़ी मुश्किल से मिले। ऊपर की मंजिल को सजाने का ध्यान भी किसी को नहीं आया। दीवारों का प्लास्टर का काम अधूरा पड़ा था।
माँ और पिताजी दीदी का कन्या दान करने नीचे के मंडप के पास बैठ गए थे। सारे रिश्तेदार भी नीचे ही बैठे थे। ऊपर की मंजिल में सिर्फ मेरे ससुराल पक्ष के लोग थे। मेरे बड़े भैया और भाभी ने मेरा कन्या दान किया। एक तो माँ और पिताजी की कमी खल रही थी, ऊपर से ऐसे पंडितजी मिले थे कि केवल १०मिन्ट में शादी निपटादी। बहुत हंगामा मचा। मेरी नयी ज़िन्दगी की शुरुवात होने से पहले ही अशांति से भर गयी। सब मेरे माता पिता को कोस रहे थे कि न कोई सजावट, न सही पंडित, न कोई रिश्तेदार देखने वाला। भैया की और मेरी आँखें भर आयी। जिन माता पिता का नाम रोशन करने का सपना था , वह उस दिन बदनाम हो रहा था। दिल छल्ली हो गया कि इसकी भर पायी अब किस्मत कैसे करवाएगी। दो अलग स्थान पर शादी का मंडप लगवाना अन्ध विश्वास था या नहीं, यह तो नहीं पता , लेकिन होनी को कोई नहीं टाल सकता।
बड़ी दीदी की तबियत एकाएक खराब हो गयी , सो मुझे दीदी को हर रस्म पर संभालना पड रहा था। हम दोनों बहनों की शादी एक ही मंडप में आयोजित की गयी थी, लेकिन दक्षिण भारत से आये मेहमानोने बताया कि अगर दो बहनों की शादी एक ही मंडप में होगी तो एक के नसीब में सिर्फ दुःख होगा और दूसरी के नसीब में सिर्फ खुशियाँ। यह सुनते ही माँ बहुत सहम गयी। अभी सोच ही रही थी कि आगे क्या और कैसे करना है उतने में बारातें पहुंच गयी थीं।
परिवार के सभी लोग बरात के स्वागत में इतने मग्न हो गए थे कि किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि हम दोनों बहनें घर पर भूखे थीं। फेरों का वक़्त होने लगा तो माँ को याद आया कि अगर वो बात सच हुई तो बेटियों की ज़िन्दगी बिगड़ जायेगी। इसलिए आनन् फ़ानन में ऊपरी मंजिल पर दूसरा मंडप लगवाया। कम समय में एक और पंडितजी बड़ी मुश्किल से मिले। ऊपर की मंजिल को सजाने का ध्यान भी किसी को नहीं आया। दीवारों का प्लास्टर का काम अधूरा पड़ा था।
माँ और पिताजी दीदी का कन्या दान करने नीचे के मंडप के पास बैठ गए थे। सारे रिश्तेदार भी नीचे ही बैठे थे। ऊपर की मंजिल में सिर्फ मेरे ससुराल पक्ष के लोग थे। मेरे बड़े भैया और भाभी ने मेरा कन्या दान किया। एक तो माँ और पिताजी की कमी खल रही थी, ऊपर से ऐसे पंडितजी मिले थे कि केवल १०मिन्ट में शादी निपटादी। बहुत हंगामा मचा। मेरी नयी ज़िन्दगी की शुरुवात होने से पहले ही अशांति से भर गयी। सब मेरे माता पिता को कोस रहे थे कि न कोई सजावट, न सही पंडित, न कोई रिश्तेदार देखने वाला। भैया की और मेरी आँखें भर आयी। जिन माता पिता का नाम रोशन करने का सपना था , वह उस दिन बदनाम हो रहा था। दिल छल्ली हो गया कि इसकी भर पायी अब किस्मत कैसे करवाएगी। दो अलग स्थान पर शादी का मंडप लगवाना अन्ध विश्वास था या नहीं, यह तो नहीं पता , लेकिन होनी को कोई नहीं टाल सकता।
Story is building up... excitement...
ReplyDeleteafter all all mighty is the director of the story....
Delete