anek naam

अजीब थे बचपन के दिन , कोई तितली कह कर बुलाता , कोई श्रीदेवी , कोई अन्नू मल्लिक , तो कोई अंजी बा। यह सिलसिला कॉलेज में भी चलता रहा , कभी शायरी गर्ल नाम , कभी मैचिंग मैचिंग रानी नाम, कभी रवल रानी यानि क्वीन ऑफ़ डायमंड्स , तो कभी स्मॉल गॉड नाम।  पिताजी तो मुझे बचपन से अब तक भी क्वेश्चन माय लॉर्ड नाम से बुलाते है।
 माँ और पिताजी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए तीसरी कक्षा से टूशन लगवा दिया। टूशन टीचर के घर मुर्गी पकाते थे , इसलिए हम चारों भाई बहन टीचर के घर के बाहर बैठ कर ख़ुद ही पढ़ते थे। टीचर आये दिन मंदिर चली जाती और सबका रिवीजन करवाने की जिम्मेदारी मुझे देती थी।  मैं उस वक़्त कक्षा ३ में थी , पढ़ाई में  अव्वल आती।  छोटी उम्र में ही टूशन करवाना आगया।  १०वी की पढ़ाई के साथ पड़ोसियों के बच्चों को पढ़ाती थी। 
बचपन में हर रविवार को मैदान में खेलने जाते थे।  साईकल चलना सीख रही थी कि गिर के हाथ मुड गया और बेहोश हो गयी। भाई घबराकर पिताजी को ले आए और घर के पास हड्डी के मालिश वाले से हाथ सही करवाया।  घर पहुंचते ही माँ ने हाथ को हर जगह से घूमकर देखा और अनजाने में फिर बिगाड़ दिया।  ३ मिनट की चोट ३ महीनों से ठीक हुई। 
एक बार तो जब माकन बदल रहे थे तो सामान बालकनी से नीचे ट्रक में रख रहे थे। घर दूसरी मंजिल पर था , तो भाई ने बालकनी से नीचे ट्रक में रखे गद्दों पे छलांग लगायी , और मैंने भी देखा देख छलांग लगयी और बेहोश हो गयी।  भाई डर के भाग गए सोच कर कहीं मर तो नहीं गयी , सबको माँ से बहुत डाँट पड़ी। 
जब भी मैं कैरम बोर्ड या ताश या छुपन छुपाई खेलती तो हार जाती , तब बड़े भैया झूठ मूठ का खेल खेलकर खुद हार जाते और मुझे जिताकर खुश कराते। 
आज भी जब मैं दुखी होती हूँ तो भैया दूर बैठे ही मुझे खुश करते है। 

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