anokha paryatan

 शादी के बाद लोग घूमने के लिए दूर शहरों में जाते हैं , जहाँ हसीन वादियाँ हो, ठंड़ी हवाएँ हो और एकांत हो , ताकि नव वधु एक दुसरे को जान सके और एक दुसरे को समझ सके। लेकिन मेरी किस्मत में तो ऐसा नहीं था क्योंकि घर में बहुत मेहमान थे और हमें बात करने का मौका नहीं मिल रहा था। मेरे पति ने मुझे बाहर घूमाने के लिए अपने माता पिता की आज्ञा ली और मुझे तैयार होने को कहा। मुझे तो जैसे एक नया जीवन दान मिल गया हो , तुरंत तैयार हो कर निकली , यह सोच कर कि गाँव में कोई बगीचा होगा वहाँ ले जा रहे है, या कोई रेस्टोरेंट में खाना खिलाने या कोई फिल्म दिखाने ले जा रहे है। 

मैं तो बड़े शहर से पहली बार गाँव में रहने आयी थी। मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि गाँव में पार्क , सिनेमा घर और होटल नहीं होते हैं। बड़ी मुश्किल से पहली बार साड़ी ख़ुद से पहनी थी। सोचा अच्छी जगह जाने के लिए अच्छा दिखना होगा। जब मैं मोटर साइकिल से उतरी तो देखा कि कुछ सुन सान जगह थी। उजाड़ लग रहा था , न कोई आता जाता , न कोई मकान। बड़े संकोच से मैंने धीमी आवाज़ में पुछा , यह कौनसी जगह है ? जवाब सुनकर हैरान रह गई। वह एक रेल्वे स्टेशन था गाँव का , जहाँ सिर्फ प्लेटफॉर्म के अलावा और कुछ नहीं था। दूर एक गार्ड हाउस था , जहाँ हल्की रौशनी दिख रही थी। 

मुझे अपने ख्यालों पे हँसी आ रही थी कि क्या सोचा था और कहाँ आ गई मैं। सोच रही थी कि इनको इतना भी नहीं पता कि कैसी जगह घूमाना चाहिए। मैंने फिर पुछा की हम यहाँ क्यों आए हैं , तो जवाब मिला कि वही एक जगह थी पूरे गाँव में, जहाँ मुझे लम्बा घूंघट नहीं निकालना पड़ेगा। एक सुकून मिला कि थोड़ी देर के लिए ही सही, कम से कम मैं आराम से बैठ कर बातें तो कर सकती थी खुली हवा में।  वहाँ मुझे बताया गया कि कैसे जो रुपये घूमने जाने के लिए पति ने जोड़ रखे थे वे मेरी शादी के लिए मेरे पिताजी को उधार दे दिए थे। मुझे यह बात पहले पता नहीं थी, सुनकर मेरे दिल में उनके लिए इज़्ज़त और बढ़ गयी। लेकिन दूसरी बात सुनकर मन उदास हो गया कि उनको थोड़े ही दिनों की छुट्टी मिली थी इसलिए ३ दिन बाद ही वे लखनऊ ड्यूटी पे चले जाएंगे। सुनकर ऐसा लगा जैसे जंग के मैदान में मुझे अकेला छोड़ कर जा रहे हो। प्रभु की माया तो प्रभु ही जानते थे। भविष्य में क्या होगा इसका अंदाज़ा बिलकुल भी नहीं लगा पा रही थी 

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