badalti kismat
बदलती किस्मत भी बहुत अनोखा अनुभव करवाती है। पिताजी शहर जाते ही दुकान का सारा काम काज सीख गए। ४ साल बाद माँ को भी शहर ले गए। शुरुवात में घर चलाने में दिक्कत हुई। बड़े भाई के जनम के बाद और ज़िम्मेदारी बढ़ गयी। बहुत कसौटी करनी पड़ी। जब कुछ महीने के भाई को पास लिटा कर खाना कहते थे तो भाई पेशाब कर देता और वह धार थाली में गिर जाती , फिर थाली को टेढ़ा रखके खाना नितार कर खाना पड़ता था।
धीरे धीरे वक़्त बीतता गया। बड़े भाई के बाद दीदी, फिर मेरा जनम हुआ। पिताजी मुझे बहुत शुभ समझते थे क्योंकि मेरे जनम के बाद से ही उन्होंने भागेदारी में दुकान शुरु की। एक एक करके उन्होने अपने भाईयों को शहर में दुकानों में काम दिलवाया। अपने पूरे गाँव के नौजवानों को शहर में काम दिलाकर अपने क़दमों पर खड़ा करा , ताकि जो तकलीफ़ पिताजी ने देखी वह और कोई न देखे।
रोज सुबह मेरा चेहरा देख कर पिताजी दुकान जाते, ऐसे ही अपनी मेहनत से खुद की बड़ी दुकान करली , और अपने भाईयों को भी खुद की दुकान बनाने में मदद की। मैं जब ५ वर्ष की हुई तो हमारे घर में नौकर चाकर थे, पहली वॉशिंग मशीन, पहला वीसीआर, डायोनोरा की टीवी , टेपरीकॉर्डर , काम वाली बाई , आदि सुख आराम थे।
पिताजी के दयालु स्वाभाव से सारी बिरादरी वाले बहुत प्रभावित थे। सभी लोग उनका अधिक आदर सत्कार करते थे। पिताजी और माँ हर किसी गाँव से आए व्यक्ति की घर बसाने में मदद करते थे। हमारा परिवार जब गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाते तो वहाँ के लोग लाइन से पीछे पीछे आते हमारे कपड़े देखते , टॉफ़ी माँगते , जैसे कि हम कोई विदेश से आये हो। बहुत ही अनोखा अनुभव था वह सब। सारे गाँव के बुज़ुर्ग गर्व से आशीर्वाद देते और पिताजी की मेहनत को बहुत सराहना देते।
उन्न दिनों रेल गाड़ी का सफर ३ दिन का होता था। स्टेशन से गाँव जाने के लिए छकड़ा गाड़ी ही मिलती थी। बहुत रोमांचक लगता यह सब। आज वह गाँव खाली खाली सा लगता हैं। सभी लोग शहरों में बस गए , और बड़े बुज़ुर्ग सब दुनिया छोड़ भगवान के घर चले गए। कई मकान तो खंडर बन गए।
धीरे धीरे वक़्त बीतता गया। बड़े भाई के बाद दीदी, फिर मेरा जनम हुआ। पिताजी मुझे बहुत शुभ समझते थे क्योंकि मेरे जनम के बाद से ही उन्होंने भागेदारी में दुकान शुरु की। एक एक करके उन्होने अपने भाईयों को शहर में दुकानों में काम दिलवाया। अपने पूरे गाँव के नौजवानों को शहर में काम दिलाकर अपने क़दमों पर खड़ा करा , ताकि जो तकलीफ़ पिताजी ने देखी वह और कोई न देखे।
रोज सुबह मेरा चेहरा देख कर पिताजी दुकान जाते, ऐसे ही अपनी मेहनत से खुद की बड़ी दुकान करली , और अपने भाईयों को भी खुद की दुकान बनाने में मदद की। मैं जब ५ वर्ष की हुई तो हमारे घर में नौकर चाकर थे, पहली वॉशिंग मशीन, पहला वीसीआर, डायोनोरा की टीवी , टेपरीकॉर्डर , काम वाली बाई , आदि सुख आराम थे।
पिताजी के दयालु स्वाभाव से सारी बिरादरी वाले बहुत प्रभावित थे। सभी लोग उनका अधिक आदर सत्कार करते थे। पिताजी और माँ हर किसी गाँव से आए व्यक्ति की घर बसाने में मदद करते थे। हमारा परिवार जब गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाते तो वहाँ के लोग लाइन से पीछे पीछे आते हमारे कपड़े देखते , टॉफ़ी माँगते , जैसे कि हम कोई विदेश से आये हो। बहुत ही अनोखा अनुभव था वह सब। सारे गाँव के बुज़ुर्ग गर्व से आशीर्वाद देते और पिताजी की मेहनत को बहुत सराहना देते।
उन्न दिनों रेल गाड़ी का सफर ३ दिन का होता था। स्टेशन से गाँव जाने के लिए छकड़ा गाड़ी ही मिलती थी। बहुत रोमांचक लगता यह सब। आज वह गाँव खाली खाली सा लगता हैं। सभी लोग शहरों में बस गए , और बड़े बुज़ुर्ग सब दुनिया छोड़ भगवान के घर चले गए। कई मकान तो खंडर बन गए।
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