college ki hawa na lagna

कॉलेज का माहौल खुशनुमा था क्योंकि वह केवल लड़कियों के लिए ही था। हर शुक्रवार को नयी फ़िल्म लगने पर बहुत लड़कियाँ कक्षा में नहीं आती थी ,लेकिन सब मुझे कह कर जाते कि अगले दिन नोट्स उनको दे दू।  सबको पता था कि कोई कक्षा में जाए या न जाए , मैं ज़रूर जाऊँगी , इसलिए मुझ पर निर्भर रहते थे।  उन दिनों  कक्षा में १८ लड़कियाँ साउथ अफ़्रीका से थी , जो अपने देश से स्कॉलरशिप मिलने पर मैनेजमेंट की पढ़ाई करने भारत आयी थी। हम १९ लड़कियाँ भारतीय थी।  जब भी फ़िल्म की वजह से मेरी सहेलियाँ कक्षा में नहीं आती तो लगता था कि मैं विदेश आगई हूँ , क्योंकि बाकी सब तो अफ्रीकन थी।

अफ्रीकन सहेलियों का पहनावा , बोल चाल सब अलग था।  कुछ के तो १० वर्ष के बच्चे भी थे।  उनके अनोखे नाम पुकारने में अटपटा लगता था। कोई मस्ती में रहने वाली तो कोई कुछ बनने के लिए दिलचस्पी से पढ़ने वाली। हमेशा सुबह का लेक्चर उनसे मिस हो जाता क्योंकि वे रात को देर तक जागती और सुबह को देर तक सोती। उनको भारतीय खाना बहुत तीखा और तेल वाला लगता।  वे सिर्फ उबली मूंगफली का पानी और चावल खाते थे।

वे जब भी मेरे पास बैठते तो मुझको इधर उधर छूते थे जो मुझे पसंद नहीं आता और उनको ऐसा करने पर अदब से मना कर देती थी। किसीको कोई ऑडियो कैसेट या ड्रेस मटेरियल चाहिए होता तो मैं सिटी मार्किट से लाकर देती थी। उनको नोट्स फ़ोटो कॉपी करवा के देती , मेरी किताबें भी हॉस्टल लेजाने देती थी।  सबसे एक जैसी दोस्ती रखती थी। मेरी यह बात उनको अति प्रिय थी, इसलिए उन्होंने मेरा नाम स्माल गॉड रख दिया था। बहुत अच्छा लगता था कि मैं किसी के काम आ सकी। वे मुझसे पूछते थे कि जब मुझे ज़ूक़ाम लगता है तो क्या में नाक की लौंग उतार कर साफ़ करती हूँ क्या ? तो उनको विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बिना लौंग निकाले कैसे कोई नाक पोछ पाता है।
जिस तरह कीचड में कमल साफ़ रहता है , उसी तरह मैंने भी अपने आपको संभाले रखा।  कभी चरित्र पे कोई दाग नहीं लगने दिया। 

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