dost ke roop mein farishta

माँ और बड़े भाई बहन को पता था की मुझे पढ़ने की कितनी चाह है , उन्होंने पिताजी को आगे की पढ़ाई के लिए यह कह कर मना लिया कि और किसी को पढ़ने में दिलचस्पी नहीं है , कम से कम छोटी बहन को तो आगे पढ़ने दो, इसके हिस्से का काम हम कर लेंगे। पिताजी मान गए और बीकॉम की फीस जमा की जो सिर्फ़ २०००/- थी। लेकिन मेरा मन मैनेजमेंट की पढ़ाई करने का था। भाई ने कहा अभी यह पढ़ाई करो तब तक कुछ पैसों का इंतज़ाम करते हैं।

एक हफ्ते तक में बीकॉम की कक्षा में बैठी , और अचानक एक दिन मेरी सहेली ने मुझे उसके साथ उसकी मैनेजमेंट की कक्षा में बैठने को कहा।  मैंने बहुत मना किया कि ऐसे तो लेक्चरर डाँटेंगे कि अलग विषय की छात्रा उनकी कक्षा में कैसे बैठ गयी।  लेकिन मेरी सहेली नहीं मानी , कहा कोई डरने की बात नहीं , कोई कुछ नहीं कहेगा।  मैं डरते डरते उसके साथ जाकर बैठ गयी।  लेकिन जब अटेंडेंस में मेरा नाम पुकारा गया तो मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरा नाम मैनेजमेंट की क्लॉस में कैसे आया। मन ही मन सोच रही थी कि बड़े भैया ने पैसों का इंतज़ाम इतनी जल्दी कर दिया क्या , और मुझे  बताया नहीं।  मैं बहुत बहुत खुश थी। मन ज़ोर से झूम रहा था। लेक्चरर के जाने के बाद सहेली ने बताया कि उसके पापा ने मेरा एडमिशन मैनेजमेंट के कोर्स में करवा दिया, क्यों कि वह यह नहीं देख सकती थी कि मैं मेरिट लिस्ट में सेलेक्ट होने के बावजूद भी बीकॉम की पढ़ाई कर रही थी , सिर्फ फीस न भर पाने के कारण। 

यह सुनकर मेरी आँख भर आयी। मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था।  पता नहीं चल रहा था कि उसका शुक्रिया कैसे अदा करु। वह मेरी ज़िन्दगी में फ़रिश्ता बनकर आयी थी। ऐसी दोस्ती का क़र्ज़ मैं आज तक भी नहीं चुका सकी।  लेकिन मेरी सहेली ने कहा कि अगर मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई में अव्वल अंकों से उत्तीर्ण होती हूँ तो समझलू कि उसका क़र्ज़ उतार दिया। भगवान सबको ज़िन्दगी में एक ऐसा दोस्त ज़रूर दे जो बिना कहे ही दोस्त का हाल समझले। मैं बहुत खुश नसीब हूँ मुझे उसकी दोस्ती का खज़ाना मिला। 

Comments

Popular posts from this blog

andh vishwas

sabhyata nahi chodi

dil toh bachha hai