ek aur nayi duniya
जाने अनजाने परमात्मा मुझे नई दुनिया में ले आये थे। जी हाँ मेरी नई नौकरी एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में लगी थी। शायद परमात्मा यह चाहते थे कि मैं आने वाले वक़्त के लिए तैयार रहूँ, जो आज के दौर में डिजिटल युग कहलाता है। मैंने ड्यूटी के दौरान लंच की छुट्टी में कॉम्प्यूटर्स की ट्रैनिंग ली। बहुत शांत माहौल था। सभी सीखने वाले जो वहाँ कोर्स करते थे , मेरे स्वभाव की बड़ी प्रशंसा करते थे और सहानभूति दिखाते थे कि मुझे सुबह से रात तक ड्यूटी करनी पड़ती थी, फिर भी कोई शिकायत नहीं करती थी। हर तरह के व्यवहार वाले लोग वहाँ आते थे जैसे बुजुर्ग लोग, बच्चे , नौ जवान लोग, आर्मी के लोग, वगैरा वग़ैरा। सभी से स्नेहपूर्वक बात करती थी।
कइयों ने तो शादी के प्रस्ताव भी रखे मेरे आगे। मैंने ख़ुशी ख़ुशी उनको इंकार कर दिया। एक बार किसी को पेमेंट देनी थी तो गलती से ५०० रुपए का एक नोट ज्यादा दे दिया था। ऑफिस में मैडम से बहुत डाँट पड़ी। मैंने कहा कोई बात नहीं जिनको पैसे दिए है उनको फ़ोन करके वापस मांग लूंगी। मैडम ने कहा इसका कोई फायदा नहीं होगा , कोई पैसे वापस नहीं लौटाता। मैंने हार नहीं मानी , एक कोशिश करके उस व्यक्ति को इत्मीनान से समझाया तो वह एक्स्ट्रा नोट लौटाने आ गया। मैडम हैरान थी कि ऐसा होना अचम्बे की बात है, और कहा कि मेरी किस्मत अच्छी थी जो सब संभल गया। मेरा यह जीवन का सिद्धांत बन गया कि हम अच्छे तो सब अच्छे।
सच्चाई और ईमानदारी से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं होता। एक ज़माना था कि मैं स्कूल में सोचती थी कि इन मुहावरों का क्या मोल , सिर्फ पढ़ने के काम आते हैं ,और तो कहीं जीवन में उपयोग नहीं इनका। लेकिन मैं ग़लत थी , जीवन का हर मोड़ कब कौनसा सबक हमें सीखा दे पता नहीं। हक़ीक़त में यह तो जीवन के ही पहलु हैं। परमात्मा की शुक्रगुज़ार हूँ कि नेकी की राह पर वह मेरा साथ कभी नहीं छोड़ते।
कइयों ने तो शादी के प्रस्ताव भी रखे मेरे आगे। मैंने ख़ुशी ख़ुशी उनको इंकार कर दिया। एक बार किसी को पेमेंट देनी थी तो गलती से ५०० रुपए का एक नोट ज्यादा दे दिया था। ऑफिस में मैडम से बहुत डाँट पड़ी। मैंने कहा कोई बात नहीं जिनको पैसे दिए है उनको फ़ोन करके वापस मांग लूंगी। मैडम ने कहा इसका कोई फायदा नहीं होगा , कोई पैसे वापस नहीं लौटाता। मैंने हार नहीं मानी , एक कोशिश करके उस व्यक्ति को इत्मीनान से समझाया तो वह एक्स्ट्रा नोट लौटाने आ गया। मैडम हैरान थी कि ऐसा होना अचम्बे की बात है, और कहा कि मेरी किस्मत अच्छी थी जो सब संभल गया। मेरा यह जीवन का सिद्धांत बन गया कि हम अच्छे तो सब अच्छे।
सच्चाई और ईमानदारी से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं होता। एक ज़माना था कि मैं स्कूल में सोचती थी कि इन मुहावरों का क्या मोल , सिर्फ पढ़ने के काम आते हैं ,और तो कहीं जीवन में उपयोग नहीं इनका। लेकिन मैं ग़लत थी , जीवन का हर मोड़ कब कौनसा सबक हमें सीखा दे पता नहीं। हक़ीक़त में यह तो जीवन के ही पहलु हैं। परमात्मा की शुक्रगुज़ार हूँ कि नेकी की राह पर वह मेरा साथ कभी नहीं छोड़ते।
Its very beautiful 👌🏻👌🏻.
ReplyDeleteshukriya
DeleteSuperb meaningful
ReplyDeletethank you so much
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