jashne jeet
जो इंसान लड़कियों के ज़्यादा पढ़े लिखे होने पर ऐतराज़ करते थे , वो अब मानने लग गए कि लड़कियाँ भी लड़कों के बराबर हक़ रखती हैं। मेरी कामयाबी का जशन सबसे ज़्यादा मेरे पिताजी और होने वाले ससुरजी ने मनाया था , वोः भी अनोखे अंदाज़ में। पिताजी मुझे अपनी दुकान ले गए और अपने सभी व्यापारी दोस्तों से मिलवाया यह कहकर कि "देखो यह मेरी बेटी है , पूरे कॉलेज में अव्वल आयी है। " मैंने पहले कभी पिताजी का यह रूप नहीं देखा था। मैंने उन सभी लोगों का आशीर्वाद लिया। सभी प्रसन्न होकर पिताजी से बोले कि बिटिया तो अपने पापा की फोटो कॉपी है आदर सत्कार के गुण , सादगी और होश्यारी में। पिताजी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया , क्योंकि इतने सालों में किसी ने भी पहले ऐसा नहीं कहा था। पिताजी बहुत खुश हुए और बोले "तुम्हे जो चाहिए तुम मांग लो " बस फिर , मैंने और आगे की पढ़ाई के लिए आज्ञा मांग ली। पिताजी झट से मान गए , यह कहकर कि अगर मेरे ससुराल वालों को ऐतराज़ नहीं होगा तो उनको भी कोई आपत्ति नहीं।
अब मन बड़ा बेचैन हो गया, यह सोच कर कि अगर ससुराल वालों ने मना कर दिया तो मैं क्या करूंगी। कुछ क्षण के लिए मैं प्रभु को भी भूल गयी थी, लेकिन प्रभु मुझे नहीं भूले थे। अगले दिन मैंने ऐसे ही बैठे बैठे सोचा कि इंटरव्यू असलियत में होता कैसा है , क्यों न आज़माया जाए। मैं सिटी बैंक में ट्रायल के लिए गयी , और मेरा असलियत में सिलेक्शन हो गया और अपॉइंटमेंट लेटर भी मिल गया। सोने पे सुहागा हो गया। उनको मेरा सच्चाई और सादगी से जवाब देना पसंद आगया , और मैंने नौकरी करने का सोचा भी नहीं था , न कोई तजुर्बा था। पिताजी और घरवालों को दुगनी ख़ुशी हो गयी।
शाम को जब पिताजी ने मेरे ससुराल फ़ोन लगाया और सारी बात बताई तो वे भी बहुत खुश हुए। उन्होंने आगे पढ़ने की अनुमति भी दे दी। ससुरजी ने अपने फैक्ट्री में सबको मेरे कामयाबी की मिठाई बाँटी और गर्व से बताया कि उनकी होने वाली बहू उनके बेटे से भी अधिक पढ़ने जा रही है। उस ज़माने में ऐसा किस्सा होना आश्चर्य की बात थी। सच है कि अगर बंदा हिम्मत करके पहला कदम उठाले तो परमात्मा ९९ क़दम उसकी तरफ मदद के उठाते है, फिर मंज़िल ज़्यादा दूर नहीं रहती।
Vow awesome..nice and very positive write up.
ReplyDeletethanx a lot
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