kitaabi duniya se parey

नौकरी का पहला दिन , और पहली सीख कि ऑफिस के लोगों को कुछ मीठा खिलाने का मतलब मस्का लगाना होता है। मैं तो सीधी साधी सी तोहफ़े में मिली चॉकलेटों को लेके ऑफिस चली गई। मैंने सोचा कि मेरी सफलता की मिठास सबके साथ बाँटू , इसलिए बॉस को, मैनेजर को और बाकी स्टाफ़ को दी। सबने सोचा की शायद मेरी शादी की तारिक पक्की हो गई इसलिए मुबारकबाद  दे रहे थे।  फिर मैंने कहा की यह तो मैं ऐसे ही सबको दे रही हूँ। मैनेजर साहब ने कहा ऐसे तो मैं उन सबको मस्का लगा रही हूँ कि अगर काम करने में कोई गलती हो जाए तो मुझे किसी से डाँट न पड़े। यह मेरी क़िताबी दुनिया से परे , असल की दुनिया थी जहाँ हर कर्म का अर्थ किसी मतलब से जोड़ दिया जाता था। मैंने सच्चे मन से सबकी ग़लत फैमी दूर की और समझाया के कैसे अव्वल आने पर सबने दुगनी ख़ुशी मनाई ।  तब से ही मुझे चॉकलेट गर्ल का खिताब मिल गया , और हर रोज़ बेवजह सबका मुँह मीठा कराती रही। 

ज़िन्दगी के इस पहलु में मैंने जाना कि असलियत में टारगेट  किसे कहते है।  वह जो पढ़ाई के लिए टाइम टेबल फॉलो करते हैं वह सिर्फ किताबी है। सच्चाई में तो वक़्त के पाबन्द होकर , शीघ्रता से दिए कार्य को पूर्ण करना, वह भी मैनेजर्स की कड़ी निगरानी में बिना हँसी मज़ाक के , जबरदस्त मेन्टल प्रेशर में काम समाप्त करने को टारगेट कहते है।

लेकिन मैंने कड़ी मेहनत से, थोड़ा हँसी मज़ाक के साथ वे कार्य सफलता पूर्वक कर दिए। केवल १४ दिनों में मैंने महीने भर का टारगेट आसानी से पूरा कर दिया। मेरी इस सफलता को परखने चेन्नई हेड ऑफिस से उच्च अधिकारी लोग आए। मेरे काम करने के ढंग को जानकार हैरान रह गए कि सिर्फ मीठी आदरनीय  बोली से , लोगों की भावनाओं को समझकर स्नेह से बात करने से और थोड़ी हँसी मज़ाक से माहौल चुस्त रखने से टारगेट आसानी से अचीव हो जाते हैं। मेरे काम की खूब सराहना हुई। 

कहते है कभी कभी ख़ुद की ही नज़र लग जाती है , मेरे साथ भी वही हुआ। माँ सुबह जल्दी  मेरा लंच बना नहीं पाती थी , इसलिए मुझे रोज़ होटल का खाना खाना पड़ा , और ३ महीने में फ़ूड पोइशनिंग हो गई । तब नौकरी छोड़नी पड़गयी। 

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