mata pita se kabhi kuch nahi chupana chahiye

ज़िन्दगी का पहला पल घूँघट का, बहुत अजीब एहसास था। रेल गाडी से सभी ससुराल वालों के साथ समारोह स्थल पहुँच रहे थे। लम्बे घूँघट की आदत न होने की वजह से एक स्टेशन पर उतर कर अगले बोघी में जा बैठी। सभी को मेरे इस बर्ताव से बुरा लगा। मुझे तभी समझ जाना चाहिए था कि ऐसे सिद्धांत वाले परिवार में अगर मेरी शादी हुई तो मेरे सपने और जुनून सब ख़त्म हो जाएंगे। मगर होनी को कौन टाल सकता था।

समारोह निपटाके अपने शहर, अपने घर लौट आयी। इधर माँ ने नौकरी ढूंढने को मना कर दिया, यह कह कर कि अब कुछ महीने घर ग्रहस्ती के काम सीख लूँ, दूसरी तरफ एम् बी ए की परीक्षा। दोनों तरफ मन लगा के सीखा। परीक्षा अच्छे से पास हो गयी। बस एक साल की पढ़ाई बाकि थी। लड़के वाले शादी करवाने की जल्दी मचा रहे थे। इनकार करने पर मुझे दिलासा दिलाया गया कि ससुराल वाले मुझे अपनी बेटी की तरह रखेंगे और पढ़ाई पूरी करवाएंगे।

मेरी बड़ी बहन का भी वक़्त हो चला था शादी का , इसलिए माँ ने कहा कि पैसों की तंगी की वजह से दो अलग शादियों का खर्चा नहीं उठा सकते। आखिर कार मुझे उनके फैसले को मानना पड़ा। शादी की तारिक पक्की हुई लेकिन पैसों का बंदोबस्त न हो सका।

बड़े भैया ने बैंकों के कार्निवल में भाग लिया, और ३ -४ बैंकों में लोन के लिए अर्जी भर दी। भोला सा भाई यह नहीं जान पाया कि इतनी सारी बैंकों में एक साथ लोन के लिए मदद लेना अपराध माना जाता है। वह तो बस अपनी बहनों की शादी धूम धाम से करवाना चाहता था, और सोचा कि कोई न कोई एक बैंक से लोन पास हो ही जाएगा। मगर बदकिस्मती से बैंको के एसोसिएशन ने भाई को कस्टडी में बुलवाया और कड़ी पूछ ताच की कि कहीं उनका इरादा सारे पैसे लेकर फरार होने का तो नहीं था। पिताजी और बिज़नेस पार्टनर को बुलवाया यह जानने के लिए कि सबको इस बात की खबर थी या नहीं। लेकिन किसी को भी भनक नहीं थी , भाई ने सोचा जब लोन मिल जाएगा तब बता देंगे। यह रहस्य महँगा पड़ गया। आनन् फानन में जुर्माना भरना पड़ा। पैसे तो थे नहीं , सो एक बार फिर मेरी सहेली के पिताजी ने मदद की। भाई को छुड़ा तो लिया , लेकिन रेड मार्क घोषित कर दिया की भविष्य में कभी भी किसी बैंक से अपने नाम पर लोन नहीं ले सकेंगे। इसलिए हर बच्चे को अपने माता पिता से कभी कुछ नहीं छुपाना चाहिए।  

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