mukhoto wali duniya
दिल खोल के बातें करना, हँसना, नाचना, गाना, अपने से छोटों पर रौब जमाना और मन में कड़वाहट रख कर ज़बान से मीठा बोलना, यह नकली मुखोटों वाली ज़िन्दगी बड़ी अटपटी सी लग रही थी। कौन अपना - कौन पराया , समझ पाना मुश्किल था। ससुराल की दहलीज़ पर कदम रखते ही अनोखा नज़ारा देख कर घबरा गयी थी मैं। पुश्तैनी ढोली मुँह मांगी रक़म पाने के लिए ज़ोर ज़ोर से ढोल पीटता जा रहा था। दो दिन से भूखी, जी में बेचैनी और सर दर्द में, वह ढ़ोल की आवाज़, हालत बत्तर कर रही थी। एक तो गर्मी के दिन, ऊपर से बड़ा सा घूंघट, सब सहन करना पड़ा। उस वक़्त पता नहीं था की वह घूंघट ज़िन्दगी भर की कैद की सज़ा बन जाएगी। सबको अपना नेक लेने की पड़ी थी , किसी ने मेरी तबियत पूछना ज़रूरी नहीं समझा। लोगों और रिश्तेदारों का बातें करने का अंदाज़ भी ऐसा था जैसे बहस या झगड़ा कर रहे हो। बस एक ही बात ख़याल में आ रही थी की माँ ने मुझे घर से क्यों निकाल दिया।
ऐसी झूठ भरी दुनिया थी जहाँ कोई किसी की तारीफ़ नहीं करता था, यह सोच कर कि अगर भूले से भी तारीफ़ की तो कहीं सर चढ़ कर न बैठ जाए। सब अपने मुँह मिट्ठू बन रहे थे , पीठ पीछे बुराई और आमने सामने अपनी तारीफ़ खुद ही करते थे। इस मुखोटो वाली दुनिया में अजीब सी बेबसी और पाबंदी का खौफ हो रहा था। जागरण के दिए की निगरानी करते करते रात बीती। अगले दिन फिर निराहार मंदिरों के दर्शन के लिए गए। ३ दिन हो गए थे खाना खाये। मन ही मन भगवान को कोस रही थी कि शादी जैसी अनुभूति क्यों रखी ज़िन्दगी में। इतने दस्तूर न जाने किसने बनाए होंगे। बार बार एक ख़याल दिल में आ रहा था, क्या में सब अच्छे से निभा पाऊँगी ? बस एक छोटी सी उम्मीद थी कि जीवन साथी ने एक बार संभाला है तो आगे भी संभाल लेंगे।
सारे रिवाज़ निपटाने के बाद जब रात को खाना खाने बठे सब परिवार वाले , तो मुँह मीठा कराते कराते कुछ खाने की इच्छा ही नहीं रही। लेकिन हमसफ़र ने देखा कि मैं भूखी थी और मीठा नहीं खाना था तब दही बड़े मंगवाए मेरे लिए, जो पेट की हालत के लिए सही था। उनके लिए दिल में इज़्ज़त और बढ़ गयी। एक अंदरूनी ख़ुशी महसूस हुई कि कोई एक तो है जिसने नकली मुखौटा नहीं पहना।
ऐसी झूठ भरी दुनिया थी जहाँ कोई किसी की तारीफ़ नहीं करता था, यह सोच कर कि अगर भूले से भी तारीफ़ की तो कहीं सर चढ़ कर न बैठ जाए। सब अपने मुँह मिट्ठू बन रहे थे , पीठ पीछे बुराई और आमने सामने अपनी तारीफ़ खुद ही करते थे। इस मुखोटो वाली दुनिया में अजीब सी बेबसी और पाबंदी का खौफ हो रहा था। जागरण के दिए की निगरानी करते करते रात बीती। अगले दिन फिर निराहार मंदिरों के दर्शन के लिए गए। ३ दिन हो गए थे खाना खाये। मन ही मन भगवान को कोस रही थी कि शादी जैसी अनुभूति क्यों रखी ज़िन्दगी में। इतने दस्तूर न जाने किसने बनाए होंगे। बार बार एक ख़याल दिल में आ रहा था, क्या में सब अच्छे से निभा पाऊँगी ? बस एक छोटी सी उम्मीद थी कि जीवन साथी ने एक बार संभाला है तो आगे भी संभाल लेंगे।
सारे रिवाज़ निपटाने के बाद जब रात को खाना खाने बठे सब परिवार वाले , तो मुँह मीठा कराते कराते कुछ खाने की इच्छा ही नहीं रही। लेकिन हमसफ़र ने देखा कि मैं भूखी थी और मीठा नहीं खाना था तब दही बड़े मंगवाए मेरे लिए, जो पेट की हालत के लिए सही था। उनके लिए दिल में इज़्ज़त और बढ़ गयी। एक अंदरूनी ख़ुशी महसूस हुई कि कोई एक तो है जिसने नकली मुखौटा नहीं पहना।
Beautiful..jeevan sathi ka samjhna bhut jroori hai.
ReplyDeletesahi kaha
DeleteCultural Shift... adaptation time taking process..but hope matters...A lovely life partner gives magical feeling..
ReplyDeletejust one good support or gesture gives confidence to win the battle of life.
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