nayi lehar ne bahaa liya..

सन्न २००० से लोगों की ज़िन्दगी में कई सारी आधुनिकता आ गयी थी , जैसे पेजर, कॉर्डलेस फ़ोन, मोबाइल फ़ोन, आदि। ऐसे में एक और नयी लहर चली थी "कॉल सेन्टर्स" की। जो भी नव युवक कॉल सेन्टर में नौकरी ढूंढता तो उसे अमेरिकन एक्सेंट सीखनी पड़ती थी। में जिस कंप्यूटर ट्रैनिंग सेन्टर में नौकरी करती थी, वहाँ इ.सी.आर.एम् नाम का नया कोर्स लॉन्च किया गया था। नसीब की बात थी कि बॉस ने मुझे भी वह कोर्स करने को कहा ताकि मैं अगले नए बैच को सीखा सकूं। कोर्स ख़त्म होने पर पार्टिसिपेंट्स को कॉल सेन्टर भेजा गया, मुझे भी जाने का ऑर्डर मिला था ताकि इंटरव्यू के सेलक्शन क्राइटेरिया के बारे में बॉस को बता सकूँ। मैं तो हर राउंड क्लियर करती गयी , आखिर में अपॉइंटमेंट लेटर देने से पहले मुझसे एक आखरी सवाल पुछा गया कि मुझे वह नौकरी क्यों करनी चाहिए , जवाब में मैंने दिल की बात कही कि राजस्थानियों में लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाते नहीं , नौकरी तो बिलकुल भी नहीं करने देते , बस उसी प्रथा को गलत साबित करना चाहती थी।

मुझे लगा कि मेरे ऐसे जवाब देने की वजह से मुझे तुतरंत बहार निकाल देंगे, क्योंकि वह बात उनकी कंपनी के काम नहीं आएगी। बाकी सब लोगों ने ऐसे उत्तर दिए थे कि नया काम है तो मज़ा आएगा ,किसी ने कहा कुछ नया सीखने को मिलेगा , और लोगों ने कहा अपना हुनर दिखाने का अच्छा मौका मिलेगा, वगैरा वगैरा। थोड़ी देर में नतीजे घोषित किए गए और सिर्फ मेरा ही नाम सेलेक्ट किया गया , बाकी सब रिजेक्ट हो गए।  निर्णय दल का मानना था कि मेरे जवाब में कुछ कर दिखाने का जूनून था जो उनकी कंपनी के लोगों को और अच्छा काम करने में प्रोत्साहित करेगा। सबने खूब ताली बजायी मेरा लिए।

मैं अजीब विडंबना में थी , हंसु या रोऊँ कुछ समझ नहीं पा रही थी। मुझे लगा मैं बॉस के ऑर्डर फॉलो कर रही हूँ, मगर यह नहीं सोचा कि अगर सेलेक्शन हो गया तो आगे क्या करना होगा। कहीं बॉस ने मना कर दिया तो कॉल सेंटर वाले क्या सोचेंगे मेरे बारे में कि मेरी सब बातें झूठी थी।

प्रभु की कृपा से बॉस ने नया जॉब करने की आज्ञा दे दी लेकिन एक शर्त पर कि मैं उन्हें और उनकी टीम को जॉब के टिप्स शेयर करती रहू। आखिर कार नयी लहर ने मुझे अपने संग बहा लिया। 

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