nazuk bandhan

कभी कभी दिमाग इतना भर जाता है कि दिल खली सा महसूस होता है, भीड़ में भी तन्हा , पता नहीं क्या लुट गया हो जैसे। और कभी दिल इतना भर जाता है दुनिया की बातों से कि दिमाग खाली लगने लगता है, पता नहीं चलता क्या बोले , क्या करे, बस सुन्न हो जाता है सब कुछ जैसे। यही हालत थी बड़े भैया की और मेरी जब ससुराल पक्ष के लोगों ने तानें मारे। ऐसे में भैया की झुकी हुई नज़रों को देख कर, और मेरी आंसुओं की धरा को सुनकर एक ख़ास आवाज़ ने जैसे डूबते को तिनके का सहारा दे दिया। जी हाँ दूल्हे ने सबको शान्त रहने को कहा और नम्रता से मेरा हाथ थामा जैसे के कहना चाह रहे हो , फ़िक्र मत करो , मैं संभाल लूँगा। सबको समझाया कि पंडित ऐसा निकला तो इसमें दुल्हन वालों की क्या गलती।

सबने बात मानी और नीचे की मंजिल वाले पंडितजी को ऊपर बुलवाके दुबारा सही विधि से शादी संपन्न कराई। अगले दिन नव जोड़े को निराहार रहकर मंदिरों में फेरी लगानी थी। यह दूसरा दिन था खाना न खाए हुए। दर्शनों के बाद शाम को बिदाई के इंतज़ाम में हम बहनों को खाना खिलाना फिरसे भूल गए सब लोग । अब तबियत बिगड़ने लगी थी। सभी से मिलने मिलाने में अपनी बड़ी दीदी से ही नहीं मिल सकी। इसे कहते है होंठों तक पानी आते आते हाथों से बह गया। दोनों बहनों की शादी साथ हुई मगर एक दुसरे की शादी का आनंद भी नहीं उठाया। यहाँ तक कि एक आखरी बार गले भी नहीं मिल पाए विदा होते समय।

अब किसके भाग्य में सुख था और किसके दुःख यह तो आज भी बताना मुश्किल है। जो कमी मुझे हुई वह दीदी की ज़िन्दगी में पूरी थी, और जो दीदी की ज़िन्दगी में कमी थी वह मेरी ज़िन्दगी में भर पूर थी। एक दूजे को दुःखी समझ कर असली ख़ुशी को समझ नहीं पाए। सच तो यह है कि हर दुःख में एक संघर्ष की ख़ुशी छुपी होती है , जो न तो किस्मत से पहले और न ही किस्मत से ज्यादा किसी को मिल सकी और न मिल पायेगी। अब बस अपने नए बसेरे को देखना था। सबसे बिछड़ने का ग़म इतना था कि कब नई मंज़िल पर पहुंच गयी पता नहीं चला।


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