prabhu ke sahaare naiyya paar
मैं एक सीधी साधी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे हर बात लिख कर बताना अच्छा लगता था। मैंने कभी हॉबी क्लॉस भी नहीं की।इसलिए प्रतियोगिताओं में बहुत कम भाग लेती थी। लेकिन जिस भी प्रतियोगिता में भगवान के भरोसे भाग लिया, प्रभु ने संभाला और जीत का अनुभव कराया।
स्कूल के दिनों में चित्रकारी एक आम प्रतियोगिता थी , मुझे तो पानी वाले रंगों से शेडिंग भी नही आती थी , इसलिए मोम के रंगों से चित्र पूरा किया। ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि चित्र की भावनाओं को देखकर विजेयता घोषित होते हैं , मुझे लगा उत्तम रंग भरने वालों को मिलता है। मैं आश्चर्य चकित थी कि मुझे उस प्रतियोगिता में प्रथम इनाम मिला था। तब मुझे प्रभु की महिमा का पहला अनुभव हुआ। फिर तो उनके सहारे कई प्रतियोगिताएं जीती , जैसे कि एक माचिस की तीली से १५ मोमबत्तियाँ जलाना , २० चीजों को एक बार देखकर बिना देखे सूची बनाना वो भी बहुत कम समय में , शतरंज और म्यूजिकल चैर।
कॉलेज में भी चित्रकारी व कोलाज, अंताक्षरी और इतिहास के क्विज़ के लिए इनाम मिले। उन दिनों मैं बहुत शायरी लिखा करती थी , जिसमें से एक ख़ास थी जो सबको हमेशा पसंद आती थी और मुझे बार बार सुनाने को कहते थे। जो इस तरह थी - - -
क्या लिखूँ , क्या ना लिखूँ , आरज़ू मदहोश हैं। गिरते हैं आँसू पन्नों पर , कलम ख़ामोश है।
कभी गर्मी , कभी सर्दी , यह कुदरत के नजारे हैं। प्यास उनको भी लगती है जो दरिया के किनारे हैं।
हर कोई मेरा हो जाए , यह मेरी तक़दीर नहीं। मैं वो शीशा हूँ , जिसमें कोई तस्वीर नहीं।
दर्द से नाता है , खुशियाँ मुझे नसीब नहीं।
हमसे भी कोई प्यार करे , इतनी ख़ुशनसीब नहीं।
मेरी हिंदी की लेक्चरर ने मेरा नाम इंटर कॉलेज कविता लेखन प्रतियोगिता में मेरा नाम लिखवा दिया। विषय प्रतियोगिता के २ घंटे पहले दिया गया , "काश पाता फ़िर से बचपन " प्रभु की कृपा से इनाम मिला। मेरे पूरे कॉलेज में सिर्फ मेरे इवेंट को ही इनाम मिला था , और मझे ही पता नहीं था। जब सब दोस्तों ने बताया तो अपना इनाम लेने ऑफिस गयी।
स्कूल के दिनों में चित्रकारी एक आम प्रतियोगिता थी , मुझे तो पानी वाले रंगों से शेडिंग भी नही आती थी , इसलिए मोम के रंगों से चित्र पूरा किया। ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि चित्र की भावनाओं को देखकर विजेयता घोषित होते हैं , मुझे लगा उत्तम रंग भरने वालों को मिलता है। मैं आश्चर्य चकित थी कि मुझे उस प्रतियोगिता में प्रथम इनाम मिला था। तब मुझे प्रभु की महिमा का पहला अनुभव हुआ। फिर तो उनके सहारे कई प्रतियोगिताएं जीती , जैसे कि एक माचिस की तीली से १५ मोमबत्तियाँ जलाना , २० चीजों को एक बार देखकर बिना देखे सूची बनाना वो भी बहुत कम समय में , शतरंज और म्यूजिकल चैर।
कॉलेज में भी चित्रकारी व कोलाज, अंताक्षरी और इतिहास के क्विज़ के लिए इनाम मिले। उन दिनों मैं बहुत शायरी लिखा करती थी , जिसमें से एक ख़ास थी जो सबको हमेशा पसंद आती थी और मुझे बार बार सुनाने को कहते थे। जो इस तरह थी - - -
क्या लिखूँ , क्या ना लिखूँ , आरज़ू मदहोश हैं। गिरते हैं आँसू पन्नों पर , कलम ख़ामोश है।
कभी गर्मी , कभी सर्दी , यह कुदरत के नजारे हैं। प्यास उनको भी लगती है जो दरिया के किनारे हैं।
हर कोई मेरा हो जाए , यह मेरी तक़दीर नहीं। मैं वो शीशा हूँ , जिसमें कोई तस्वीर नहीं।
दर्द से नाता है , खुशियाँ मुझे नसीब नहीं।
हमसे भी कोई प्यार करे , इतनी ख़ुशनसीब नहीं।
मेरी हिंदी की लेक्चरर ने मेरा नाम इंटर कॉलेज कविता लेखन प्रतियोगिता में मेरा नाम लिखवा दिया। विषय प्रतियोगिता के २ घंटे पहले दिया गया , "काश पाता फ़िर से बचपन " प्रभु की कृपा से इनाम मिला। मेरे पूरे कॉलेज में सिर्फ मेरे इवेंट को ही इनाम मिला था , और मझे ही पता नहीं था। जब सब दोस्तों ने बताया तो अपना इनाम लेने ऑफिस गयी।
Superb
ReplyDeleteSuperb writing
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