insaan ki khaal mein bhediya
कंप्यूटर ऑफिस की नौकरी और एम् बी ए की पढ़ाई, दोनों साथ साथ अच्छी चल रही थी। इतनी मग्न हो गयी थी अपनी दुनिया में कि होश ही नहीं रहा कि पिताजी ने गाँव में बंगले का निर्माण समाप्त करवा दिया था। किस्मत ने यहाँ मात दे दी। बहुत मन था गृह प्रवेश के समारोह में जाने का लेकिन उन्ही दिनों मेरी परीक्षा थी। पिछली बार बड़े भाई की शादी में ठीक से शामिल न हो पाई थी , और इस बार मकान का मुहूर्त छूट रहा था।
घर के सभी लोग आधे मन से मुझे अकेला छोड़ कर चले गए। सिर्फ १० दिन के लिए। मगर पिताजी ने अपने अच्छे दोस्त को मेरी जिम्मेदारी दी, जिन पर वे आँख मूँद के भरोसा कर सकते थे। वैसे भी उन चाचाजी का परिवार भी गाँव में छुट्टी मनाने गया था। इस कारण उनके पास वक़्त था मेरी ज़िम्मेदारी लेने का।
पहले १ - २ दिन तो वे मुझे सही वक़्त पर ऑफिस लेने आ गए थे और ठीक से घर छोड़ देते थे। लेकिन तीसरे दिन छुट्टी थी रविवार की। मैं घर पर कपडे धो रही थी। चाचाजी आए जांच करने कि कोई तकलीफ तो नहीं। उनका रवैय्या कुछ अलग लग रहा था। पहले तो उन्होंने एम् टी वी लगाने को बोला , तो मैंने जवाब दिया कि मुझे टी वी देखने का शौक नहीं। उनके लिए चाय नाश्ता लाने के बहाने भीतर चली गयी , तो वे बोले ज़रुरत नहीं , बाहार आके बैठो। मैं संभल गयी , और पीछे के दरवाज़े से पड़ोसन को बुला लायी और वही पीछे की तरफ वॉशिंग मशीन संभालने लगी। चाचाजी बुलाते रहे की दो पल बात करलु उनसे, लेकिन मैं ठस से मस न हुई , और कहा कि बादमें बिजली नहीं होगी तो मेरा काम पड़ा रह जाएगा। इतने में वे इंतज़ार करते करते थक गए और लौट गए।
अगले दिन वे मुझे ऑफिस लेने देर से आए , मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा , फिर मोटर साइकिल टेढ़ी मेढ़ी चलायी ताकी उनको पकड़ सकू , लेकिन मैं घबराई नहीं। रास्ते में वे एक रेस्ट्रॉन्ट ले गए यह कह कर कि उनको बड़ी भूक लगी है, तो मैंने सब्र करा , फिर वे मेरे कपड़ों के बारे में कहने लगे कि मुझे मॉडर्न शॉर्ट्स पहनने चाहिए। बस फिर में तुरंत वहाँ से रवाना हो गयी। घर पहुंचकर पिताजी को फ़ोन किया। सारी बात बतायी। एक नया सबक सीखा कि चाहे कोई कितने भी अच्छा हो, उन पर जल्दी से भरोसा नहीं करना चाहिए। इस कलयुग में जहाँ देखो वहाँ इंसान की खाल में भेड़िये छुपे हुए हैं।
घर के सभी लोग आधे मन से मुझे अकेला छोड़ कर चले गए। सिर्फ १० दिन के लिए। मगर पिताजी ने अपने अच्छे दोस्त को मेरी जिम्मेदारी दी, जिन पर वे आँख मूँद के भरोसा कर सकते थे। वैसे भी उन चाचाजी का परिवार भी गाँव में छुट्टी मनाने गया था। इस कारण उनके पास वक़्त था मेरी ज़िम्मेदारी लेने का।
पहले १ - २ दिन तो वे मुझे सही वक़्त पर ऑफिस लेने आ गए थे और ठीक से घर छोड़ देते थे। लेकिन तीसरे दिन छुट्टी थी रविवार की। मैं घर पर कपडे धो रही थी। चाचाजी आए जांच करने कि कोई तकलीफ तो नहीं। उनका रवैय्या कुछ अलग लग रहा था। पहले तो उन्होंने एम् टी वी लगाने को बोला , तो मैंने जवाब दिया कि मुझे टी वी देखने का शौक नहीं। उनके लिए चाय नाश्ता लाने के बहाने भीतर चली गयी , तो वे बोले ज़रुरत नहीं , बाहार आके बैठो। मैं संभल गयी , और पीछे के दरवाज़े से पड़ोसन को बुला लायी और वही पीछे की तरफ वॉशिंग मशीन संभालने लगी। चाचाजी बुलाते रहे की दो पल बात करलु उनसे, लेकिन मैं ठस से मस न हुई , और कहा कि बादमें बिजली नहीं होगी तो मेरा काम पड़ा रह जाएगा। इतने में वे इंतज़ार करते करते थक गए और लौट गए।
अगले दिन वे मुझे ऑफिस लेने देर से आए , मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा , फिर मोटर साइकिल टेढ़ी मेढ़ी चलायी ताकी उनको पकड़ सकू , लेकिन मैं घबराई नहीं। रास्ते में वे एक रेस्ट्रॉन्ट ले गए यह कह कर कि उनको बड़ी भूक लगी है, तो मैंने सब्र करा , फिर वे मेरे कपड़ों के बारे में कहने लगे कि मुझे मॉडर्न शॉर्ट्स पहनने चाहिए। बस फिर में तुरंत वहाँ से रवाना हो गयी। घर पहुंचकर पिताजी को फ़ोन किया। सारी बात बतायी। एक नया सबक सीखा कि चाहे कोई कितने भी अच्छा हो, उन पर जल्दी से भरोसा नहीं करना चाहिए। इस कलयुग में जहाँ देखो वहाँ इंसान की खाल में भेड़िये छुपे हुए हैं।
Meaningful...experiential sharing helps society to develop...let's learn from these incidents...TRUST.
ReplyDeleteabsolutely right....
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