rupaye ki kadar

मेरे पिताजी एक बहुत ही गरीब परिवार से थे। मेरे दादाजी को दमे का रोग था, इसलिए थोड़ा लोहे का काम घर बैठे करते थे।  मेरे पिताजी तीन भाई और एक बहन थे , सो गुज़ारा करने के लिए वह सब भी छोटा सा काम करते थे गाँव के सड़क निर्माण में।
 पिताजी की स्कूल फ़ीस २ रूपए होती थी, लेकिन वह भी नहीं भर पाते थे , इसलिए फ़ीस माफ़ करने की अर्ज़ी लिखते थे।  तब १ रूपया कम हो जाता।  बचे १ रुपये को जोड़ने के लिए पिताजी बस स्टॉप पर लोगों की तस्वीर बनाते पेंसिल से, जिसके लिए उन्हें १० पैसे मिलते थे।  पैसे पूरे न होने पर पिताजी लकड़ी की पेटी बनाते जो मसाले रखने के काम आती , और उसको भी बस स्टॉप पे बेचते २५ पैसे में।
चप्पल न खरीद पाने के कारण , सर्दी और गर्मी में नंगे पैर चलते थे लम्बी सड़क पे। भूक लगने पर घर में खाना न होने के कारण , सड़क से भुट्टे के खाली डंडों को इखट्टा कर , उनका आटा बनाकर रोटी पकाते थे।  गाँव के लोगों से एक कटोरी छाछ माँग कर , उसमें एक भगोना पानी डाल कर , नमक मिर्च डाल कर , उसमें भुट्टे के डंडे की रोटी टुकड़े करके खाते थे। भगवान भूके पेट उठाता ज़रूर है लेकिन भूखा नहीं सुलाता।
  घर की तंगायी की वजह से पिताजी को पाँचवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।  आज उन दिनों को याद करने पर एक बुरा सपने सा लगता है। वक़्त ने पैसे की कदर करना सीखा दिया। भगवान की कृपा से, मुसीबत की घडी में काम करना आगया , परिवार के लिए मेहनत और ईमानदारी से कमाई के साधन मिलने लगे।
१४ साल की उम्र में पिताजी की शादी हो गयी  और २० बाद ही दादाजी गुज़र गए।  माँ के कदम घर में पड़ते ही किस्मत बदलने लगी।  एक साहूकार बैंगलोर सहर से गाँव आए।  उनके घर में सहायक की ज़रुरत थी, इसलिए पिताजी को सात ले गए। 

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