sacche dil se maangi muraad
मैनेजमेंट के कोर्स में एड्मिशन होने के बाद जब घर लौटी तो सब हैरान थे मुझे अधिक खुश देखकर। क्योंकि एक हफ्ते से बेमन बीकॉम की क्लॉस जा रही थी। मेरे चेहरे की मुस्कान खो गयी थी और बहुत चुप चुप रहने लगी थी। सभी घर के लोग अंदाजा लगा रहे थे कि ज़रूर इसकी पढ़ाई के बारे में कोई अच्छी बात हुई है , शायद नए दोस्त बन गए हो या बीकॉम की पढ़ाई में एडजस्ट हो गयी हो। लेकिन जब मैंने माँ , भाई और बहन को बताया कि मेरी सहेली ने मेरा दाखिला मैनेजमेंट के कोर्स में करवा दिया ,तो सब बहुत खुश हुए और कहा कि मैं किस्मतवाली हूँ कि भगवान ने मेरी दिली तम्मन्ना पूरी करदी।
बड़े भैया ने मेहनत बढ़ादी ताकि वह मेरी फीस के पैसे किश्तों में लौटा सके। पिताजी को इस बारे में ४ महीनों तक पता नहीं चला। लेकिन जब ४ महीने बाद कोट पैंट पहने तो पिताजी ने पूछा यह कपडे कैसे , तो मैंने डरते हुए कहा कि यह मेरी यूनिफॉर्म है, तो उन्होंने कहा कौनसी पढाई में यह होती है। मैंने उनको सारी बात विस्तार से बताई, तब उन्होंने कहा लड़कियाँ आखिर में बेलन मास्टर ही बनती है , ज्यादा पढ़के क्या लाभ। तब मैंने उनको भरोसा दिलवाया कि मैं पूरी ईमानदारी से कॉलेज आना जाना और पढ़ाई करूंगी। आखिर कार पिताजी ने राज़ी मन से अनुमति दे दी।
मेरे सपनों को जैसे पर मिलगये कामयाबी को छूने के लिए। नया नया कोर्स था उस दौर का , लेक्चरर की कमी थी। विषय सारे नए थे हमारे लिए। थोड़ा लाइब्रेरी का सहारा था और कुछ दूसरे कॉलेज में पढ़ने वाले दोस्तों के नोट्स का। उस दौर में न तो मोबाइल थे न इंटरनेट का चलन , जो कुछ भी इनफार्मेशन चाइये थी वह बड़ी मुश्किलों से संग्रह करनी पड़ती थी। एक बार तो क्लॉस बॉयकॉट करना पड़ा सभी विद्यार्थियों को एक हफ़्ते के लिए , तब कही कॉलेज प्रशाशक ने एक लेक्चरर नियुक्त किया।
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