saubhagy naye parivaar ko transfer hona

मेरा रिश्ता पक्का होते ही , पिताजी की किस्मत धीरे धीरे नुक्सान की तरफ मुड़ने लगी। पिताजी के छोटे भाई के ग्राहक से बड़ी रकम बकाया थी, लेकिन उस ग्राहक की मौत हो जाने से, पिताजी को लाखों का नुक्सान हुआ। इधर पिताजी गाँव में अपना बांग्ला बनवा रहे थे और कुछ ही महीने में पिताजी के छोटे भाई की मृत्यु हो गयी। भाई के व्यापार का कर्ज़ा पिताजी पर आगया। पिताजी ने अपने व्यापारी दोस्तों से रकम उधार ली , मगर यह न पता था की वह सब पिताजी से ब्याज का भी भयाज मांगेंगे।  पिताजी को बंगले के कागज़ आपूर्तिकर्ता के पास गिरवी रखने  पडे।  पिताजी ने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन भी कभी ज़िन्दगी में आएगा। 

मेरा रिश्ता जब ससुराल वालों से जुड़ा तब मेरे शुभ होने का भाग्य पिताजी से हट कर, नए परिवार से जुड़ गया।  होने वाले पति की नौकरी लग गयी बड़े शहर में , ससुरजी का भी तबादला एक बड़े शहर में हो गया।  सब बहुत खुश थे कि बहु उनके लिए सौभाग्य लायी है। 

दूसरी ओर पिताजी का व्यापार कम हो गया।  बाज़ार में मंदी का दौर था। पिताजी के सभी दोस्त अपने पैसे वापस मांग रहे थे। तभी पिताजी को पता चला कि उनके दोस्तों ने असल पर ब्याज का भी ब्याज जोड़ कर क़र्ज़ का गड्ढा और भी गहरा कर दिया था।  

मैं मन लगाकर पढ़ती रही।  १२वी में अच्छे अंक मिलने से मेरा नाम मैनेजमेंट के कोर्स के लिए मेरिट लिस्ट में चुना गया। लेकिन पिताजी ने आगे पढ़ने से मना कर दिया , क्योंकि उन् दिनों राजस्थानी घरों में लड़कियों को ज़्यादा नहीं पढ़ाते थे। ऊपर से पिताजी के व्यापार में आयी तंगी के कारण कॉलेज की फ़ीस देने में असमर्थ थे। वक़्त कभी एक सा नहीं रहता। ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव लगा रहता है।  हिम्मत से सामना करना पड़ता है।  सच्चे रिश्तेदारों कि परख मुश्किल घडी में ही पता चलती है। 

Comments

Popular posts from this blog

andh vishwas

sabhyata nahi chodi

dil toh bachha hai