suljha dimaag
एम् बी ए की तैयारी के लिए थोड़ी बहुत छान बीन की और दोस्तों से सलाह मशूरा किया और तय कर लिया एक और नई पढ़ाई का सफ़र। उस वक़्त गूगल तो नहीं देखते थे क्योंकि शुरुवाती दौर था उसका, लेकिन कॉलेज के लेक्चरर जैसे अलग अलग युनिवर्सिटी के नाम बताते , वैसे ही हम वहाँ फॉर्म जमा कर देते। ख़ुशनसीब थे हम कि उस ज़माने में लोग ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। वर्ना आज के ज़माने के जितने अधिक पढ़े लिखे लोग उतनी सलाहें , ऊपर से इंटरनेट पे खोज बीन और १०० से अधिक नए ज़माने के कोर्स देख कर पगला जाते। शायद यही वजह होगी कि नई पीढ़ी के बच्चों का दिमागी संतुलन बिगड़ता जा रहा है। उनके बर्दाश्त करने की क्षमता बहुत कम होती जा रही है।
हमारे ज़माने में कोई कोचिंग का नाम तक नहीं जानता था। आज यह एक आम नाम है अधिकतर विद्यार्थियों के लिए। पहले का दौर बहुत सुहाना लगता था कि जब मन चाहा तब खुद पढ़लिया, लेकिन अब ऐसा नहीं है। स्कूल कि पढ़ाई आधे दिन तक, फिर टूशन , हॉबी क्लॉस , एक्स्ट्रा स्टडीज , वगैरा वगैरा। बच्चों के पास वक़्त ही नहीं होता अपने मन अनुसार आराम करने का या परिवार के साथ हँस बोलने का।
प्रभु की कृपा है कि ऐसे डिजिटल युग में मेरा जनम नहीं हुआ। मैंने बिना संकोच तुरंत कुछ किताबें खरीद ली एम् बी ए के एंट्रेंस परीक्षा के लिए। केवल एक हफ़्ते प्रैक्टिस किया और पास हो गयी। सेलेक्शन के बाद डिस्टेंस लर्निंग की सुविधा को अपनाया और नई नौकरी ढूंढी ताकि अपनी फीस का इंतज़ाम खुद कर सकूँ। जितने कम चॉइस होते हैं ज़िन्दगी में , दिमाग उतना सुलझा रहता है क्षण भर में सही निर्णय लेने के लिए।
आज कल के माता पिता बढ़ते ज्ञान के कारोबार में बौखला गए हैं। ऐसे में प्रभु से एक ही प्रार्थना है मेरी कि जैसे मेरी नैय्या पार कराई वैसे सभी बच्चों को सफ़ल जीवन प्रदान करके उनका भी उद्धार करदे।
हमारे ज़माने में कोई कोचिंग का नाम तक नहीं जानता था। आज यह एक आम नाम है अधिकतर विद्यार्थियों के लिए। पहले का दौर बहुत सुहाना लगता था कि जब मन चाहा तब खुद पढ़लिया, लेकिन अब ऐसा नहीं है। स्कूल कि पढ़ाई आधे दिन तक, फिर टूशन , हॉबी क्लॉस , एक्स्ट्रा स्टडीज , वगैरा वगैरा। बच्चों के पास वक़्त ही नहीं होता अपने मन अनुसार आराम करने का या परिवार के साथ हँस बोलने का।
प्रभु की कृपा है कि ऐसे डिजिटल युग में मेरा जनम नहीं हुआ। मैंने बिना संकोच तुरंत कुछ किताबें खरीद ली एम् बी ए के एंट्रेंस परीक्षा के लिए। केवल एक हफ़्ते प्रैक्टिस किया और पास हो गयी। सेलेक्शन के बाद डिस्टेंस लर्निंग की सुविधा को अपनाया और नई नौकरी ढूंढी ताकि अपनी फीस का इंतज़ाम खुद कर सकूँ। जितने कम चॉइस होते हैं ज़िन्दगी में , दिमाग उतना सुलझा रहता है क्षण भर में सही निर्णय लेने के लिए।
आज कल के माता पिता बढ़ते ज्ञान के कारोबार में बौखला गए हैं। ऐसे में प्रभु से एक ही प्रार्थना है मेरी कि जैसे मेरी नैय्या पार कराई वैसे सभी बच्चों को सफ़ल जीवन प्रदान करके उनका भी उद्धार करदे।
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