teacher ka gyaan jeevan ka vardaan
शुरु से मैं पढ़ाई में तेज़ थी। इसलिए टूशन टीचर मुझे अपने सभी विध्यार्ती के घर मिलवाने ले जाते थे यह कह कर कि देखो यह मेरी स्टुडेंट है , फर्स्ट आती है क्लॉस में , ताकि लोगों का विश्वास टीचर पर बना रहे कि वह बहुत अच्छा पढ़ाती है। तीसरी कक्षा के बाद मकान बदल दिया, तो टूशन टीचर भी दूसरी थी। वह एक बुजुर्ग विध्वा थी। मुझे रोज एक सीख देते हुए कहानी सुनाती थी। उनकी सिखाई हुई हर बात अभी तक याद है मुझे। एक दिन जब उनके घर साँप का बच्चा आया तो विध्यार्ती उसको डण्डे से मार रहे थे। तब टीचर ने कहा कि अगर हम किसी मृत प्राणी में जॉन डालने की योग्यता नहीं रखते तो , किसी प्राणी के प्राण लेने का भी अधिकार नहीं रखते। उन्होंने बताया कि अगर हम जीवन में किसी को ख़ुशी नहीं दे सकते तो उन्हें दुःख देना का भी हक़ नहीं।
बहुत भाग्यवान हूँ कि मुझे गुरु के रूप में साक्षात् माँ सरस्वती जी का आशीर्वाद और जीवन मूल्य का ज्ञान मिला। उन्होंने मुझे इतना सक्षम कर दिया था कि १०वी के बाद कभी कोचिंग की भी ज़रुरत नहीं पड़ी। १२वी की पढ़ाई के बाद फिर मकान बदल दिया , और उन टीचर्स से कभी मिलना नहीं हुआ। उन्हें जीवन भर भूल न पाऊंगी।
१०वी में फर्स्ट क्लॉस से पास होने के बाद पिताजी ने मेरे लिए एक रिश्ता पक्का कर दिया। बहुत मना करने के बावजूद माँ नहीं मानी, और मुझे यह कह कर राज़ी किया की मुझे आगे पढ़ने देंगे। लेकिन मेरे मन में शंका थी कि लड़के वाले गाँव में रहते हैं तो कही आगे जाके मुझे अधिक पढ़ने और नौकरी करने से रोक दिया तो मेरे सपने अधूरे ही रह जाएंगे। बे मन जबरन हाँ करनी पड़ी। जो भी दीदी को देखने आते थे वे मुझे पसंद करके जाते थे। मैं भी परेशान थी कि सब मेरे ही पीछे क्यों पड़े हैं। मैं मन लगाकर पढ़ाई करती रही। आज मैं भले ही एक ग्रहणी हूँ, कोई कामयाब व्यक्ति न बन सकी , फिर भी गर्व है कि मैं एक उदार, मेहनती , ईमानदार और सत्यवादी इंसान हूँ। इसका पूरा श्रेय मेरी अध्यापिकाओं को जाता है।
बहुत भाग्यवान हूँ कि मुझे गुरु के रूप में साक्षात् माँ सरस्वती जी का आशीर्वाद और जीवन मूल्य का ज्ञान मिला। उन्होंने मुझे इतना सक्षम कर दिया था कि १०वी के बाद कभी कोचिंग की भी ज़रुरत नहीं पड़ी। १२वी की पढ़ाई के बाद फिर मकान बदल दिया , और उन टीचर्स से कभी मिलना नहीं हुआ। उन्हें जीवन भर भूल न पाऊंगी।
१०वी में फर्स्ट क्लॉस से पास होने के बाद पिताजी ने मेरे लिए एक रिश्ता पक्का कर दिया। बहुत मना करने के बावजूद माँ नहीं मानी, और मुझे यह कह कर राज़ी किया की मुझे आगे पढ़ने देंगे। लेकिन मेरे मन में शंका थी कि लड़के वाले गाँव में रहते हैं तो कही आगे जाके मुझे अधिक पढ़ने और नौकरी करने से रोक दिया तो मेरे सपने अधूरे ही रह जाएंगे। बे मन जबरन हाँ करनी पड़ी। जो भी दीदी को देखने आते थे वे मुझे पसंद करके जाते थे। मैं भी परेशान थी कि सब मेरे ही पीछे क्यों पड़े हैं। मैं मन लगाकर पढ़ाई करती रही। आज मैं भले ही एक ग्रहणी हूँ, कोई कामयाब व्यक्ति न बन सकी , फिर भी गर्व है कि मैं एक उदार, मेहनती , ईमानदार और सत्यवादी इंसान हूँ। इसका पूरा श्रेय मेरी अध्यापिकाओं को जाता है।
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