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पता नहीं क्यों शादी के बाद शुरुआत से ही दुल्हन पर नयी सास इतना दबदबा बनाके रखते हैं जैसे कोई निर्जीव कट्पुतली घर लायी हो। जैसे मन चाहा वैसे नचा लिया। अगर बहू ९९ काम अच्छे करती हो और एक काम गलत हो जाए तो सारे किये कराये पे पानी फिर जाता । वह एक गलती इतनी बड़ी नज़र आती कि बाकी ९९ अच्छायियां नज़र ही नहीं आती।
इसलिए मैंने मन ही मन मान लिया था कि "लाख़ खुशियाँ सही एक घम भुलाने के लिए, एक घम ही काफ़ी है ज़िन्दगी भर रुलाने के लिए। " लेकिन अब १६ सालों बाद यह बात बदल गयी कि "लाख़ घम सही एक ख़ुशी रोकने के लिए, अब तो एक ख़ुशी ही काफ़ी है ज़िन्दगी बिताने के लिए।
गाँव में किसी के घर मिलने जाना होता तो रात को माताजी बता देते कि अगले दिन सुबह क्या खाना बनाना है। मैं बिलकुल वैसा कर देती थी यह सोच कर कि माताजी बहुत खुश होकर तारीफ़ करेंगे। लेकिन वे क्रोध करते कि अभी ज़िंदा बैठे है तो पूछ कर काम करने का संस्कार नहीं है। घर की चाबी सँभालने को देकर रास्ते में भरोसा नहीं कहकर दुबारा ले लेते थे वह भी बेइज़्ज़त्ती करके, अजीब सी शर्मिंदगी का एहसास कराते थे मोहल्ले में। किसी का फ़ोन आजाता मोबाइल पर तो १०० सवाल उठ खड़े होते थे। न अपनी मर्ज़ी से कही आ जा सकते थे , न कोई ऐसा था जिनको अपना हाल ए दिल बयान कर सकते थे। एक विचार लगातार दिमाग में चल रहा था कि क्या यह ग़ुलामी सारी ज़िन्दगी सहन करनी होगी , क्या यह शादी टिक पाएगी , कहीं कोई फैसला लेने में गलती तो नहीं हुई।
बस लगता था कब और कैसे इस कैद से छूंटू। तब एहसास होता था की भारत आज़ादी से पहले कैसे अंग्रेज़ों की ग़ुलामी सहन करी होगी।
कहने को तो भारत अब आज़ाद देश है लेकिन आज भी कई घरों में गुलामी की बेड़िया पड़ी हुई है , बस किरदार अलग अलग है। कहीं बहु जकड़ी हुई है, तो कहीं बूढ़े माँ बाप , तो कहीं अपंग लाचार रिश्तेदार। विदेशों में तो अंधे लोग , विकलांग लोग और बेसहारा लोग अपनी जीविका अपने बल बूते पे चलाते हैं। भारत में जागरुकता की कमी है लोगों में।
इसलिए मैंने मन ही मन मान लिया था कि "लाख़ खुशियाँ सही एक घम भुलाने के लिए, एक घम ही काफ़ी है ज़िन्दगी भर रुलाने के लिए। " लेकिन अब १६ सालों बाद यह बात बदल गयी कि "लाख़ घम सही एक ख़ुशी रोकने के लिए, अब तो एक ख़ुशी ही काफ़ी है ज़िन्दगी बिताने के लिए।
गाँव में किसी के घर मिलने जाना होता तो रात को माताजी बता देते कि अगले दिन सुबह क्या खाना बनाना है। मैं बिलकुल वैसा कर देती थी यह सोच कर कि माताजी बहुत खुश होकर तारीफ़ करेंगे। लेकिन वे क्रोध करते कि अभी ज़िंदा बैठे है तो पूछ कर काम करने का संस्कार नहीं है। घर की चाबी सँभालने को देकर रास्ते में भरोसा नहीं कहकर दुबारा ले लेते थे वह भी बेइज़्ज़त्ती करके, अजीब सी शर्मिंदगी का एहसास कराते थे मोहल्ले में। किसी का फ़ोन आजाता मोबाइल पर तो १०० सवाल उठ खड़े होते थे। न अपनी मर्ज़ी से कही आ जा सकते थे , न कोई ऐसा था जिनको अपना हाल ए दिल बयान कर सकते थे। एक विचार लगातार दिमाग में चल रहा था कि क्या यह ग़ुलामी सारी ज़िन्दगी सहन करनी होगी , क्या यह शादी टिक पाएगी , कहीं कोई फैसला लेने में गलती तो नहीं हुई।
बस लगता था कब और कैसे इस कैद से छूंटू। तब एहसास होता था की भारत आज़ादी से पहले कैसे अंग्रेज़ों की ग़ुलामी सहन करी होगी।
कहने को तो भारत अब आज़ाद देश है लेकिन आज भी कई घरों में गुलामी की बेड़िया पड़ी हुई है , बस किरदार अलग अलग है। कहीं बहु जकड़ी हुई है, तो कहीं बूढ़े माँ बाप , तो कहीं अपंग लाचार रिश्तेदार। विदेशों में तो अंधे लोग , विकलांग लोग और बेसहारा लोग अपनी जीविका अपने बल बूते पे चलाते हैं। भारत में जागरुकता की कमी है लोगों में।
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