asamanjas ke pal
जब मैं ५ वर्ष की थी तभी से ही मायके में कपडे धोने की वॉशिंग मशीन देखी और बड़े होते होते इस्तेमाल करने की आदत लग चुकी थी। इसलिए जब पहली बार कम्बल, चादर हाथ से धोने की कोशिश की तो कुछ समझ ही नहीं आया कि कैसे धोना है। नल के पानी के संग आंसुओं की धारा भी बाल्टी में भर रही थी। पिताजी की कही बातें याद आ रही थी कि लड़कियों को घर ही संभालना है ज़िन्दगी भर, तो ज़्यादा पढ़ के क्या करेगी। उस वक़्त सच में मेरी पढ़ाई कुछ काम नहीं आ रही थी। प्रभु से एक वरदान माँग रही थी कि एक वाशिंग मशीन दिलादो बस, बाकी काम जैसे प्रभु की मर्ज़ी हो वैसे कर लूंगी।
दिन गुजरने लगे, और सर्दियों के दिन शुरू हो गये। माताजी अपने गाँव लौट गए। जीवन साथी अपनी नौकरी में व्यस्त रहने लगे। अकेले घर में मेरा मन नहीं लगता था। कोई पडोसी नहीं था जिनसे बात कर सकती थी क्योंकि मकान एक मज़दूरों के इलाके में था। मेरी तबीयत बिगड़ने लगी थी। माँ की बहुत याद आने लगी थी। माताजी को गाँव से बुलवाया और जाँच करवाई तो पता चला कि मैं गर्भवती थी।
जिसकी भी ज़िन्दगी में यह पल आता है तो वे ख़ुशी के मारे फूले नहीं समाते हैं। मगर मैं बड़ी चिंतित थी, एक तो ग्रहस्त जीवन ठीक से संभालना सीखा भी नहीं था, ना जीवन साथी को अच्छे से जान पायी, उनकी पसंद - ना पसंद , नौकरी भी ढून्ढ रही थी और एम् बी ए की फाइनल की परीक्षा बाकी थी। ऐसे में एक और नन्ही सी ज़िन्दगी की देखभाल , कैसे होगा सब सोच कर बेचैन थी।
मैंने सोचा की माँ से कोई दवाई या नुस्खा पूछ कर लेलूं। लेकिन जब माँ को जब फ़ोन लगाया तो मुझे समझाया कि जो हो रहा है वह परमात्मा की इच्छा से हो रहा है, दुनिया में कई ऐसे परिवार है जो कई मंदिरों में जतन करके भी संतान के सुख से वंचित है। फिर भी मैं घबराई हुई थी तो माताजी ने भी दिलासा दिया कि पहला गर्भ शायद उनका पोता हो, इसलिए वे उस बच्चे की पूरी ज़िम्मेदारी उठाएंगे जब तक मैं अपनी पढ़ाई पूरी करलूँ । क्या क्या सोचा था कि अपनी ज़िन्दगी में अगर ऐसा ख़ुशी का पल आएगा तो ऐसे मनाएंगे वैसे मनाएंगे, मगर अफ़सोस मेरी नादानी की वजह से वे पल व्यर्थ चिंता में चले गए।
दिन गुजरने लगे, और सर्दियों के दिन शुरू हो गये। माताजी अपने गाँव लौट गए। जीवन साथी अपनी नौकरी में व्यस्त रहने लगे। अकेले घर में मेरा मन नहीं लगता था। कोई पडोसी नहीं था जिनसे बात कर सकती थी क्योंकि मकान एक मज़दूरों के इलाके में था। मेरी तबीयत बिगड़ने लगी थी। माँ की बहुत याद आने लगी थी। माताजी को गाँव से बुलवाया और जाँच करवाई तो पता चला कि मैं गर्भवती थी।
जिसकी भी ज़िन्दगी में यह पल आता है तो वे ख़ुशी के मारे फूले नहीं समाते हैं। मगर मैं बड़ी चिंतित थी, एक तो ग्रहस्त जीवन ठीक से संभालना सीखा भी नहीं था, ना जीवन साथी को अच्छे से जान पायी, उनकी पसंद - ना पसंद , नौकरी भी ढून्ढ रही थी और एम् बी ए की फाइनल की परीक्षा बाकी थी। ऐसे में एक और नन्ही सी ज़िन्दगी की देखभाल , कैसे होगा सब सोच कर बेचैन थी।
मैंने सोचा की माँ से कोई दवाई या नुस्खा पूछ कर लेलूं। लेकिन जब माँ को जब फ़ोन लगाया तो मुझे समझाया कि जो हो रहा है वह परमात्मा की इच्छा से हो रहा है, दुनिया में कई ऐसे परिवार है जो कई मंदिरों में जतन करके भी संतान के सुख से वंचित है। फिर भी मैं घबराई हुई थी तो माताजी ने भी दिलासा दिया कि पहला गर्भ शायद उनका पोता हो, इसलिए वे उस बच्चे की पूरी ज़िम्मेदारी उठाएंगे जब तक मैं अपनी पढ़ाई पूरी करलूँ । क्या क्या सोचा था कि अपनी ज़िन्दगी में अगर ऐसा ख़ुशी का पल आएगा तो ऐसे मनाएंगे वैसे मनाएंगे, मगर अफ़सोस मेरी नादानी की वजह से वे पल व्यर्थ चिंता में चले गए।
Take life as it comes...
ReplyDeletelate realisation....so wishing others not to do such folly...
DeleteYes.a nice write..very well i can relate to some of its points.
ReplyDeleteearlier parents used to be shy, so never gave knowledge to their children about husband wife personal life , so it was difficult to handle circumstances. but now new generation youngsters r much informed about personal life.....
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