har sutra har vyakti ke liye sahi nahi hota
कभी कभी हर सूत्र हर एक व्यक्ति पर लागू नहीं होता , मगर बड़े बुजुर्ग अधिक अनुभवी होते हुए भी गलती कर बैठते हैं। मेरी आगे की कहानी भी कुछ ऐसे सूत्र का शिकार थी।
माताजी मुझे अपने साथ गाँव ले गयी थी। मुझे लगा था कि जिस तरह शादी से पहले माँ और पिताजी मुझे उल्टी होने पर मेरी देख भाल करते थे , ठीक वैसे ही माताजी भी मेरा ध्यान रखेंगी। मगर मेरी सारी उम्मीदें व्यर्थ थीं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टा बुजुर्ग होने के नाते उन्होंने मुझे अपने अनुभवों की बलि चढ़ा दिया, जो आगे जाकर मेरे जीवन को लाचार बनाकर रख दिया।
माताजी को लगता था की अधिक से अधिक काम करते रहने से डिलीवरी आसान होगी और बच्चा भी तंदरूस्त होगा। इसलिए दिवाली के लिए रसोई की सफाई दो महीने पहले ही शुरू करदी , यह सोचकर कि जब तक मैं वहाँ हूँ तब तक सारा घर साफ़ करा दूँ। सुबह से शाम तक बाथरूम में बर्तन मांजते मांजते जब उल्टी आ जाती तो लाड लड़ाने के बदले डाँटते कि यह तो दुनिया की सभी औरतों को होता ही है , इसमें कोई नयी बात नहीं। यह सुनकर जी भर आता था। जब खाना खाने को मिलता था तो माँ की बहुत बहुत याद आती थी। वह हमेशा कहा करती थी कि इतनी नाज़ुक मत रहा करो , वर्ना आँसू और निवाला साथ खाओगी। और वही हो रहा था, हर एक कौर में घर के नौकर जैसा भाव आ रहा था। जबकि मायके में नौकरों को भी हमेशा घर के सदस्य की तरह रखा गया था।
उस वक़्त किसी ने यह नहीं बताया कि उदास और दुःखी रहने से बच्चे पर बुरा असर पड़ता है। इसका खामियाज़ा मुझे बादमें चुकाना पड़ा। आज उस बात का अफ़सोस होता है कि काश में अपने आप में खुश रहती तो मेरे बच्चे को यातना न भोगनी पड़ती। फिर भी मैं अपने आप को समझाती रहती थी कि बुरा कोई नहीं होता, केवल हालात बुरे होते हैं , जो इंसानों से बुरा बर्ताव करवाते हैं। जैसे तैसे दुःख के दो महीने काटे और लखनऊ लौट गयी। रस्ते भर सोचती रही कि सास पहले बहू रह चुकी थी तो उन्हें मेरे साथ वैसा ही बर्ताव क्यों करना था जैसा कभी उनके साथ हुआ हो। क्या पता दहेज़ मिलता तो भी ऐसा ही करते क्या? क्या मैं उनके बेटियों जैसी नहीं लगती थी ? ...
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