honi anhoni...
किस्मत भी क्या क्या खेल दिखाती है।चाहे कितना भी गीता का पाठ पढ़ा हो, कितनी ही पूजा अर्चना करली हो, फिर भी होना वही होता है जो किस्मत में लिखा होता है। दीदी से मिलने के बाद अगले दिन कहीं बहार खाना खाने जाने का तय किया था। वैसे तो मेरा आठवां महीना शुरू होक १० दिन हुए थे , और डॉक्टर ने भी एक महीने बाद की डिलीवरी की तारिक बताई थी। इसलिए सुबह जल्दी नहाने चली गयी।
अब मुझे तो कुछ पता नहीं था कि डिलीवरी के पहले क्या लक्षण होते हैं , और ना ही माँ ने कभी ज़िक्र किया, न ही डॉक्टर कुछ इसके बारे में बताया कभी। मुझे कोई दर्द भी नहीं उठा था। बस नहाते वक़्त, नल के पानी के बहाव की तरह ख़ून का बहाव शुरू हो गया था। यह देखकर मुझे कोई घबराहट नहीं हुई थी यह सोच कर कि शायद आखरी महीने में ऐसा ही होता होगा। मगर थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही थी तो माँ को बुलाया।
माँ तो देखते ही बावली सी हो गयी , पूरे घर के लोगों को हिला दिया , सबको कोई न कोई काम बताया। मुझसे बार बार मिन्नतें कर रही थी कि जिस हालत में मैं हूँ वैसे ही बाथरूम से बाहर निकल आऊँ। मगर मैं नहीं मानी , मुझे कपडे पहनने थे। ऊपर से टॉयलेट जाने का हाल हो रहा था। माँ तो अड़ गई , बोली, "तेरे हाथ जोड़ती हूँ बेटा टॉयलेट मत जाओ , बस जल्दी अस्पताल चलो । मैंने कहा ठीक है लेकिन टॉयलेट करके ही चलूँगी।
माँ अंदर मेरे पास ही खड़ी रही और हाथ पकड़ लिया कहा जितना हुआ रहने दे बस चल। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसमें इतनी घबराने वाली बात क्या है , माँ रो क्यों रही है। सिर्फ गाउन पहनकर चलदी। सुबह का वक़्त था तो रिक्शा भी नहीं मिल रहे थे। पिताजी हाथ जोड़कर एक रिक्शे वाले को जगाया और माँ ,पिताजी और मैं अस्पताल के लिए निकल पड़े। घर से दूर था, रास्ता भी टूटा फूटा था। ७:३० बजे के निकले, ८ :३० बजे पहुंचे।
घर की सारी सीढ़ियाँ गन्दी हो गयी थी जो दीदी और भैया ने मिलकर साफ़ की। ऑटो रिक्शा भी लत पत हो गया था तो पिताजी को साफ़ करना पड़ा। माँ मुझे अंदर ले गयी। तक़दीर सही थे जो पिछली रात कोई डिलीवरी का केस हैंडल करके डॉक्टर अस्पताल में ही सो गयी थी। आनन् फानन में उनको जगाया। अस्पताल का स्टाफ़ मुझे देख कर हैरान थे और मैं उन सबके चेहरे देख कर हैरान थी।
अब मुझे तो कुछ पता नहीं था कि डिलीवरी के पहले क्या लक्षण होते हैं , और ना ही माँ ने कभी ज़िक्र किया, न ही डॉक्टर कुछ इसके बारे में बताया कभी। मुझे कोई दर्द भी नहीं उठा था। बस नहाते वक़्त, नल के पानी के बहाव की तरह ख़ून का बहाव शुरू हो गया था। यह देखकर मुझे कोई घबराहट नहीं हुई थी यह सोच कर कि शायद आखरी महीने में ऐसा ही होता होगा। मगर थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही थी तो माँ को बुलाया।
माँ तो देखते ही बावली सी हो गयी , पूरे घर के लोगों को हिला दिया , सबको कोई न कोई काम बताया। मुझसे बार बार मिन्नतें कर रही थी कि जिस हालत में मैं हूँ वैसे ही बाथरूम से बाहर निकल आऊँ। मगर मैं नहीं मानी , मुझे कपडे पहनने थे। ऊपर से टॉयलेट जाने का हाल हो रहा था। माँ तो अड़ गई , बोली, "तेरे हाथ जोड़ती हूँ बेटा टॉयलेट मत जाओ , बस जल्दी अस्पताल चलो । मैंने कहा ठीक है लेकिन टॉयलेट करके ही चलूँगी।
माँ अंदर मेरे पास ही खड़ी रही और हाथ पकड़ लिया कहा जितना हुआ रहने दे बस चल। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसमें इतनी घबराने वाली बात क्या है , माँ रो क्यों रही है। सिर्फ गाउन पहनकर चलदी। सुबह का वक़्त था तो रिक्शा भी नहीं मिल रहे थे। पिताजी हाथ जोड़कर एक रिक्शे वाले को जगाया और माँ ,पिताजी और मैं अस्पताल के लिए निकल पड़े। घर से दूर था, रास्ता भी टूटा फूटा था। ७:३० बजे के निकले, ८ :३० बजे पहुंचे।
घर की सारी सीढ़ियाँ गन्दी हो गयी थी जो दीदी और भैया ने मिलकर साफ़ की। ऑटो रिक्शा भी लत पत हो गया था तो पिताजी को साफ़ करना पड़ा। माँ मुझे अंदर ले गयी। तक़दीर सही थे जो पिछली रात कोई डिलीवरी का केस हैंडल करके डॉक्टर अस्पताल में ही सो गयी थी। आनन् फानन में उनको जगाया। अस्पताल का स्टाफ़ मुझे देख कर हैरान थे और मैं उन सबके चेहरे देख कर हैरान थी।
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