jeevan ka asli safar

रेल गाडी का सफर जैसे ज़िन्दगी का सफर दर्शा रहा था। मुझे एक नयी मंज़िल पर ले जा रहा था। अब सफर सुखद होगा या दुःखद यह तो वक़्त आगे बताने वाला था। जीवन साथी के संग रेल गाडी का सफर बहुत आसानी से कट गया, अब असल जीवन के सफर की शुरुवात की बारी थी। ससुराल पहुंच कर वहाँ से माताजी के संग जीवन साथी के घर आँगन में प्रवेश किया जो लखनऊ में था।

वह एक कार गराज था, मकान मालिक के कोठी के पीछे। बहुत ही विचित्र माकन था। नीचे तले पर मुख्य द्वार था हाल में जहाँ एक व्यक्ति के सोने के जितनी भी जगह नहीं थी। फिर ऊपर की तरफ बड़ी बड़ी खुली सीढ़ियां थीं। उसी सीढ़ी के बीच में छोटी सी रसोई थी, २ कदम पर एक ही कमरा था। इतने छोटे घर में कभी रही नहीं थी तो थोड़ा अटपटा लग रहा था।

वहॉं की बोली बहुत ही मधुर थी मगर समझने में थोड़ी सी कठिन थी। लोगों का दिल और स्वभाव भी नम्र था। एक बार तो गेहूँ पिसवाने पैदल गयी थी तो एक साइकिल रिक्शा वाले ने कहा , "बिटिया तनिक किनारे होइ जाओ " यह वाक्य इतनी तेज़ी से कहा कि मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। मुझे लगा कि कुछ डाँट के गए होंगे । आस पास के लोगों से पूछने पे पता चला कि ज़रा सड़क के एक तरफ चलने को कहा था। बहुत हँसी आयी अपने आप पर।

वहाँ का खान पान दक्षिण भारत से ज़रा भिन्न था। वहाँ के खाने का स्वाद कम पसंद आ रहा था। और जो व्यंजन मुझे पकाना आता था उनकी सामग्री वहाँ नहीं मिलती थी। एक ही कमरा था इसलिए मैं ज़मीन पर सोती थी। माताजी ने गृहस्त जीवन की बढ़िया शुरुवात कराई मगर हर चीज का ताना देकर कि रसोई के बर्तन, बिस्तर सब उनके बेटे की कमाई के थे, मेरे पिताजी ने कुछ दिया भी नहीं।

मुझे उनकी बात सही नहीं लगी क्योंकि शादी से पहले उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए। मगर शादी के बाद उनकी अधूरी ख्वाहिशों की सूची ख़त्म भी नही हो रही थी। यह देख कर मन उदास रहता था। 

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