jeevan maran ka daav
सर्दियों के दिन शुरू हो गए थे। वह मेरी पहली सर्दी थी इसलिए ज़्यादा अनुभव नहीं था कि पहन ने ओढ़ने के लिया क्या व्यवस्था होनी चाहिए। मैं तो दक्षिण भारत से थी जहाँ बारहों महीने एक जैसा मौसम था , ना अधिक गर्मी और ना ही कड़ी ठंडी , बस हल्की बारिश रोज़। एक तो गर्भवती होने के कारण असक्ति और बेचैनी थी ऊपर से सर्दी बर्दास्त नहीं हो रही थी। जीवन में पहली बार कोहरा , उम्मस , हीटर , कूलर आदि देखें थें। गर्मी और सर्दी से बचाव के तरीके भी नहीं आते थे। हालत बहुत बिगड़ती जा रही थी।
कुछ महीनों बाद माताजी ने पूछा कि उनके आने की ज़रुरत है क्या , तो हमने मना कर दिया कि कोई दिक्कत नहीं है। असल में माताजी को घुटने की तकलीफ थी, तो घर के भीतर प्रवेश द्वार से कमरे तक जाने के लिए हर रोज़ सीढ़ियां चढ़नी उतरनी पड़ती थी वह भी कई कई बार , जिससे माताजी को बहुत तकलीफ हुई थी , और बिस्तर की भी कमी थी , ऊपर से वह मकान बस एक शेड और दीवारों से बना था जहाँ धूप बिलकुल भी नहीं आती थी। ऐसे में माताजी को और तकलीफ ना हो जाए यह सोच कर अपनी परेशानियाँ ख़ुद सँभालना सही समझा।
मेरा छठा महीना लग गया था। ठंड से पेट अकड़ गया था। शुरुवाती दिनों में बहुत काम करने से और उदास रहने से , खाना ठीक से न खाने से बच्चे का बढ़ना कम हो गया। खून की दस्त लगनी शुरू हो गयी। अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने भर्ती होने को कहा कि बच्चा काफी नीचे आ चूका है, शायद सातवें महीने में ही डिलीवरी हो जाए। या बच्चा अपंग पैदा हो सकता है। कई टेस्ट करवाएं , दवाइयाँ ली मगर कुछ असर नहीं हुआ।
आखिर में माताजी को बुलवाना पड़ा। वे मुझे अपने साथ अहमदाबाद ले गए । स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने में बहुत दिक्कत हो रही थी इसलिए स्टेशन से सीधा अस्पताल पहुंचे। इंजेक्शन लगवाया और पैर ऊँचा रख कर बस आराम करने को कहा। टहलने और काम करने को भी मना कर दिया था। दिल ही दिल में उस वक़्त को कोस रही थी कि अगर मैंने माताजी को लखनऊ आने से ना रोका होता तो अच्छा होता। काश उन्होंने मुझसे भारी काम ना करवाया होता , काश मेरा माईका दूर ना होता तो इतनी यातनाएँ ना झेलनी पड़ती। यह सब छोटी छोटी बातें लगती हैं लेकिन कभी कभी यही बातें किसी के जीवन मरण का कारण बन जाते हैं।
कुछ महीनों बाद माताजी ने पूछा कि उनके आने की ज़रुरत है क्या , तो हमने मना कर दिया कि कोई दिक्कत नहीं है। असल में माताजी को घुटने की तकलीफ थी, तो घर के भीतर प्रवेश द्वार से कमरे तक जाने के लिए हर रोज़ सीढ़ियां चढ़नी उतरनी पड़ती थी वह भी कई कई बार , जिससे माताजी को बहुत तकलीफ हुई थी , और बिस्तर की भी कमी थी , ऊपर से वह मकान बस एक शेड और दीवारों से बना था जहाँ धूप बिलकुल भी नहीं आती थी। ऐसे में माताजी को और तकलीफ ना हो जाए यह सोच कर अपनी परेशानियाँ ख़ुद सँभालना सही समझा।
मेरा छठा महीना लग गया था। ठंड से पेट अकड़ गया था। शुरुवाती दिनों में बहुत काम करने से और उदास रहने से , खाना ठीक से न खाने से बच्चे का बढ़ना कम हो गया। खून की दस्त लगनी शुरू हो गयी। अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने भर्ती होने को कहा कि बच्चा काफी नीचे आ चूका है, शायद सातवें महीने में ही डिलीवरी हो जाए। या बच्चा अपंग पैदा हो सकता है। कई टेस्ट करवाएं , दवाइयाँ ली मगर कुछ असर नहीं हुआ।
आखिर में माताजी को बुलवाना पड़ा। वे मुझे अपने साथ अहमदाबाद ले गए । स्टेशन की सीढ़ियाँ उतरने में बहुत दिक्कत हो रही थी इसलिए स्टेशन से सीधा अस्पताल पहुंचे। इंजेक्शन लगवाया और पैर ऊँचा रख कर बस आराम करने को कहा। टहलने और काम करने को भी मना कर दिया था। दिल ही दिल में उस वक़्त को कोस रही थी कि अगर मैंने माताजी को लखनऊ आने से ना रोका होता तो अच्छा होता। काश उन्होंने मुझसे भारी काम ना करवाया होता , काश मेरा माईका दूर ना होता तो इतनी यातनाएँ ना झेलनी पड़ती। यह सब छोटी छोटी बातें लगती हैं लेकिन कभी कभी यही बातें किसी के जीवन मरण का कारण बन जाते हैं।
Comments
Post a Comment