kaal chakra
सुबह के ठीक १० बजे एक पल का मौन हुआ फिर मेरी आँखों पर एक कपडा डाल दिया गया। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था , लेकिन आवाज़ सुनाई दे रही थी "अरे बच्चा रो नहीं रहा , जल्दी करो , मारो मारो" मन को धक्का लगा मनो दुनिया ख़त्म हो गयी हो , इतने में ज़ोर से मारने की आवाज़ आयी। मौन को चीरती हुई पहली किलकारी ऐसे प्रतीत हो रही थी मानो कितने कर्मों का दण्ड भोगने इस धरती पर आना पड़ा हो।
बच्चे की आवाज़ सुनकर फिर मैं बेहोश हो गयी। शाम के ४ बजे होश आया तो देखा आस पास पूरा परिवार है , लेकिन बच्चा नहीं। मैंने पापा से पूछा दूर के चाचाजी जो मेरे सगे नन्दोई लगते है , उनको अभी ही क्यों बुलाया अस्पताल। पिताजी ने बताया कि सिर्फ उन्हीं का ब्लड ग्रुप मेरे ब्लड ग्रुप से मैच हुआ , इसलिए तुरंत मेरी मदद के लिए आ गए। यह जान कर बहुत ख़ुशी हुई। उनको बहुत धन्यवाद किया।
एक मेरे मौसाजी भी थे वहाँ जो कई सालों से हमारे घर आते नहीं थे। मेरे बचपन के मोह ने उनको भी मजबूर कर दिया एक आखरी बार मुझे एक नज़र देखने को। बस मुझे होश में आता हुआ देख वहाँ से चल दिए।
मैंने दीदी को बुलाकर पूछा , लूला लंगड़ा , बहरा या अँधा , क्या हुआ है , कोई नहीं बता रहा लड़का है या लड़की। दीदी ने कहा लड़की हुई है मगर अभी कुछ कह नहीं सकते। हैरान परेशान होकर फिर पूछा , क्या हुआ उसको , कहाँ है वो ? दीदी ने बताया कि उसके लंग्स डेवेलोप नहीं हुए इसलिए ठीक से सांस नहीं ले पा रही है। मन में हिम्मत जुटा कर पूछा , "क्या उसको यहाँ ला सकते है ?" दीदी ने कहा , मुमकिन नहीं , उसको एक काँच के बक्से में रखा गया है , नाक और मुँह में नलियाँ लगी हुई है , तुम यह सब देख नहीं पाओगी। वैसे भी उसे बच्चों के अस्पताल से एक एम्बुलेंस लेने आ रही है। मैंने कहा बड़े अस्पताल जाने से पहले कम से कम एक बार तो देखलूँ।
पिताजी मुझे पकड़ कर बच्ची को दिखाने ले गए। हल्की सी झलक देखते ही वैन वाले उसे ले गए। मैंने एक हथेली जितना छोटा बच्चा पहली बार देखा था , यहाँ तक की मेरे सारें रिश्तेदारोंने भी पहली बार इतना दुबला पतला नान्हा सा बच्चा देखा था।
बच्चे की आवाज़ सुनकर फिर मैं बेहोश हो गयी। शाम के ४ बजे होश आया तो देखा आस पास पूरा परिवार है , लेकिन बच्चा नहीं। मैंने पापा से पूछा दूर के चाचाजी जो मेरे सगे नन्दोई लगते है , उनको अभी ही क्यों बुलाया अस्पताल। पिताजी ने बताया कि सिर्फ उन्हीं का ब्लड ग्रुप मेरे ब्लड ग्रुप से मैच हुआ , इसलिए तुरंत मेरी मदद के लिए आ गए। यह जान कर बहुत ख़ुशी हुई। उनको बहुत धन्यवाद किया।
एक मेरे मौसाजी भी थे वहाँ जो कई सालों से हमारे घर आते नहीं थे। मेरे बचपन के मोह ने उनको भी मजबूर कर दिया एक आखरी बार मुझे एक नज़र देखने को। बस मुझे होश में आता हुआ देख वहाँ से चल दिए।
मैंने दीदी को बुलाकर पूछा , लूला लंगड़ा , बहरा या अँधा , क्या हुआ है , कोई नहीं बता रहा लड़का है या लड़की। दीदी ने कहा लड़की हुई है मगर अभी कुछ कह नहीं सकते। हैरान परेशान होकर फिर पूछा , क्या हुआ उसको , कहाँ है वो ? दीदी ने बताया कि उसके लंग्स डेवेलोप नहीं हुए इसलिए ठीक से सांस नहीं ले पा रही है। मन में हिम्मत जुटा कर पूछा , "क्या उसको यहाँ ला सकते है ?" दीदी ने कहा , मुमकिन नहीं , उसको एक काँच के बक्से में रखा गया है , नाक और मुँह में नलियाँ लगी हुई है , तुम यह सब देख नहीं पाओगी। वैसे भी उसे बच्चों के अस्पताल से एक एम्बुलेंस लेने आ रही है। मैंने कहा बड़े अस्पताल जाने से पहले कम से कम एक बार तो देखलूँ।
पिताजी मुझे पकड़ कर बच्ची को दिखाने ले गए। हल्की सी झलक देखते ही वैन वाले उसे ले गए। मैंने एक हथेली जितना छोटा बच्चा पहली बार देखा था , यहाँ तक की मेरे सारें रिश्तेदारोंने भी पहली बार इतना दुबला पतला नान्हा सा बच्चा देखा था।
Entry of an angel...happy...hope rest all things fall in place...
ReplyDeletehope so, but life is full of twists n turns....
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