maut ka farmaan

बाहरी हलचल से बेखबर मैं ऑपरेशन के लिए तैयार हो गई। बहुत देर से मैंने माँ और पिताजी को देखा नहीं था, बस डॉक्टर साहिबा की आवाज़ सुनाई दे रही थी कि जल्द से जल्द ब्लड़ डोनर का इंतज़ाम कीजिए। माँ की हल्की हल्की आवाज़ आ रही थी कि इतने महीने बेटी ने दुःख देखा है, बच तो जाएंगे न.....

मैं सोचने लगी कि माँ ऐसे क्यों बात कर रही है, पता नहीं क्या चल रहा है बाहर। मैं पूछना चाहती थी सब मगर कोई नर्स भी मेरे पास नहीं थी , इतने में डॉक्टर साहिबा आ गई। उन्होने ने मुझे एक कागज़ पर दस्तख़त करने को कहा यह बता कर कि मेरा पेट पूरी तरह से सिकुड़ गया है और खून भी काफी बह गया है तो किसी एक जान को बचाने की कोशिश कर सकते है। मेरी राय मांगी कि बच्चे को या मुझे बचाना है , और मैंने तुरंत कहा बच्चे को बचालो, मुझे तो वैसे भी नहीं जीना। मैंने बहुत ख़ुशी से अपने मौत के फरमान पर दस्तख़त कर दिया। डॉक्टर साहिबा ने कहा देखते हैं क्या होता है और जल्दी जल्दी और डॉक्टरों को मेरी स्थिति बताई। सारे टीम वाले हैरान होकर बोले ऐसा तो पहला केस देखा है उनके जीवन में और सबने भगवान को प्रार्थना करके ऑपरेशन शुरू किया।

ऐसी स्थिति में भी मेरा दिमाग शांत और नादानी भरी बातें सोच रहा था, जब एनेस्थेसियन ने मुझे अपने नाक से अपने घुटने को छूने को कहा , वो भी बैठ कर नहीं बल्कि तिरछा लेट कर। अंदर ही अंदर हँसी आरही थी कि ऑपरेशन कर रहे हैं या सर्कस , भला ऐसे  पेट के साथ कोई कैसे घुटना छू सकता है , बच्चा तो यूँही मर जाएगा अगर गोल हो कर सोई। लेकिन उनकी बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था।

बड़ी मुश्किल से कोशिश की यह करतब करने की मगर पता नहीं उनको और कितना चाहिए था , बस डाँट रहे थे और अच्छे से गोल मुड़ो। एक बार तो सोचा क्या ऑपरेशन पीछे पीठ की तरफ़ से करेंगे क्या ? फिर मैंने ज़ोर से कहा और कितना मुडु। इतने में डॉक्टर साहिबा ने कहा जितना हुआ ठीक है , जल्दी इंजेक्शन लगाओ। इतने खतरनाक तरीके से इंजेक्शन घुसाया कि इंसान की जान न भी जाने वाली होती तो भी वह मर जाता।


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