rookhe ko bhi hasna sikha diya

क्या ज़माना था , उन दिनों डॉक्टर सिर्फ मरीज़ की सेवा का उद्देश्य रखते थे, मगर इस नए दौर में चंद ही ऐसे डॉक्टर है कहीं कहीं। डॉक्टर साहिबा ने मुझे एक और नर्स को सौंप दिया और खुद शिशु विशेषज्ञ को तुरंत आने को कहा , साथ ही बाकी टीम को भी बुलवाया। नर्स ने मुझे पहली मंजिल पर चलने को कहा , तो मैंने नादानी में कहा कोई बात नहीं मैं नीचे इंतज़ार करती हूँ आपका , आप ज़रूरी सामान नीचे ले आओ , ख़ामख़ा सारा अस्पताल गन्दा हो जायेगा। नर्स भड़क गयी, बस जल्दी चलने का हुक्म दिया।

पता नहीं क्यों उस दिन बड़ी निश्चिन्त थी, जहाँ सब लोग हड़बड़ी मचा रहे थे , वहाँ मैं आराम से बातों में पड़ी थी , कोई तेज़ी नहीं दिखा रही थी। मुझे लग रहा था कि निश्चिन्त रहने से शायद बी.पी कम हो जाएगा, और एक फूले पेट से भी जल्द ही छुटकारा मिल जाएगा क्योंकि मैं सोचती थी कि गर्भावस्था में ८ महीनों तक दो ज़िन्दगी का ध्यान अकेले रखना पड़ा वह भी बड़ी नाज़ुकी से ,  बच्चे के जनम के बाद एक ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाऊँगी। परिवार के लोग तो संभाल ही लेंगे बच्चे को, तो मैं जैसे चाहे वैसे बैठ उठ सकती हूँ बादमें। आज यह सब याद करके हंसी आती है अपने भोलेपन पर।

धीरे धीरे ऊपरी वार्ड में गयी , तो देखा कमरा खाली था। कुछ छोटे बड़े औज़ार रखे थे और एक विचित्र पलंग था। नर्स ने एक औज़ार हाथ में उठाया और मुझे बिना गौन लेटने को कहा । मैं चौक गई और नर्स से पुछा क्या आप मेरा ऑपरेशन करने वाली हो ? वह थोड़ी गुस्सैल थी तो बेरुखी से जवाब दिया नहीं बस ऑपरेशन के लिए आपकी सफाई करनी है। अब मैं फिर हैरान हो गयी और कहा , लेकिन मैं तो अभी अभी नहा के आयी हूँ। कम से कम इस बात पे वह थोड़ा मुस्कुराई और बोली ठीक है, मगर अपनी ड्यूटी तो करनी पड़ेगी।

इतने सालों में न जाने कितने बदलाव मुझमें आगए, तब बड़ी से बड़ी बातों में भी शांत रहती थी और अब छोटी छोटी बातों में भी परेशान हो जाती हूँ। शायद शरीर अब काम का बोझ ज़्यादा नहीं झेल पाता इसलिए चिड़चिड़ा स्वभाव बनगया हो। वह मासूमियत कब और कैसे खो गयी इस ज़िन्दगी के नाटक में पता ही नहीं चला।   

Comments

Popular posts from this blog

andh vishwas

sabhyata nahi chodi

dil toh bachha hai