toph mein barood
मुसीबत जब आती है तो चारों ओर से आती है। माताजी को लगा घर का काम कर नहीं सकती तो बैठे बैठे ५ साड़ियाों में कुंदन लगा सकती है। वे अपनी बेटियों को भेठ देना चाहती थी। भविष्य के खतरे से अंजान मैंने वह काम शुरू कर दिया। तकलीफ तो हो रही थी घंटों बैठे रहने में, एक एक नग बराबर की दूरी पर लगाने के लिए झुकना भी पड़ रहा था, वो भी प्रेस को ज़ोर से दबाकर चिपकाने पड़ रहें थें । एक दो बार माताजी को बताया कि तकलीफ होती है उस काम में , तो उन्होंने मुझे मेरी बहन के घर जाने को कहा।
मन की मुराद पूरी हो रही थी। शादी के बाद पहली बार उनसे मिलने जा रही थी। ख़ुशी में अपने दुःख दर्द सब भूल रही थी। लेकिन माताजी ने कहा बस कुछ घंटों के लिए जाना है और वे साड़ियों का काम वहाँ पूरा करना है। यह तो वही बात हो गई कि चाहे इधर मारो या उधर, मरना तो निश्चित है। फिर भी सोचा कम से कम दीदी और जीजाजी से मिलना हो जाएगा।
मगर वहां पहुंच कर मेरे काम की वजह से किसी से भी ठीक से बात ना कर सकी। माताजी बार बार फ़ोन करके घर जल्दी आने को कहते रहे सो दीदी के परिवार वाले मुझे घर पहुंचा गए। जब मेरा जनम दिन आया तो ससुराल में बस आशीर्वाद मिला , और कुछ भी मीठा नहीं खिलाया। तो दीदी से रहा न गया और मेरी पसंद की पेस्ट्री छुपा कर देने आयी, क्योंकि माताजी मुझे ऐसी चीजें खाने को मना करते थे। मैंने दीदी का मन रखने के लिए थोड़ा सा खाया वो भी कमरे के बाथरूम में जाकर , बाकी का टुकड़ा दीदी को खिला दिया।
माताजी की आँखें और दिमाग बहुत तेज़ थे , उन्होंने दीदी के जाने के बाद बार बार मुझसे गिफ्ट दिखाने को कहा। मेरे लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माने। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो दीदी के हाथ में एक छोटा डब्बा था , लेकिन जब वो गयी तो डब्बा नहीं था , इसका मतलब कुछ तो मुझे देकर गयी होंगी। मैं घबरा गयी , सोचा अगर पेस्ट्री की बात बताई तो दीदी को भी बहुत डाँटेंगे , इसलिए चुप रही।
मुझे पता नहीं था की मेरी हर बात तोप में बारूद भरने का काम कर रही थी। यह किस दिन फटेगा यह तो वक़्त ही जानता था। हमेशा से मेरे मन में विचार आते थें कि लोग कैसे किसी और इंसान को कठपुतली की तरह नियंत्रित करते होंगे , खुद इंसान होकर भी दूसरों को पालतू जानवर समझ लेते हैं , प्रभु ने ऐसे लोगों को धरती पे क्यों भेजा होगा , इत्यादि कई सारी बातें थी जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
मन की मुराद पूरी हो रही थी। शादी के बाद पहली बार उनसे मिलने जा रही थी। ख़ुशी में अपने दुःख दर्द सब भूल रही थी। लेकिन माताजी ने कहा बस कुछ घंटों के लिए जाना है और वे साड़ियों का काम वहाँ पूरा करना है। यह तो वही बात हो गई कि चाहे इधर मारो या उधर, मरना तो निश्चित है। फिर भी सोचा कम से कम दीदी और जीजाजी से मिलना हो जाएगा।
मगर वहां पहुंच कर मेरे काम की वजह से किसी से भी ठीक से बात ना कर सकी। माताजी बार बार फ़ोन करके घर जल्दी आने को कहते रहे सो दीदी के परिवार वाले मुझे घर पहुंचा गए। जब मेरा जनम दिन आया तो ससुराल में बस आशीर्वाद मिला , और कुछ भी मीठा नहीं खिलाया। तो दीदी से रहा न गया और मेरी पसंद की पेस्ट्री छुपा कर देने आयी, क्योंकि माताजी मुझे ऐसी चीजें खाने को मना करते थे। मैंने दीदी का मन रखने के लिए थोड़ा सा खाया वो भी कमरे के बाथरूम में जाकर , बाकी का टुकड़ा दीदी को खिला दिया।
माताजी की आँखें और दिमाग बहुत तेज़ थे , उन्होंने दीदी के जाने के बाद बार बार मुझसे गिफ्ट दिखाने को कहा। मेरे लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माने। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो दीदी के हाथ में एक छोटा डब्बा था , लेकिन जब वो गयी तो डब्बा नहीं था , इसका मतलब कुछ तो मुझे देकर गयी होंगी। मैं घबरा गयी , सोचा अगर पेस्ट्री की बात बताई तो दीदी को भी बहुत डाँटेंगे , इसलिए चुप रही।
मुझे पता नहीं था की मेरी हर बात तोप में बारूद भरने का काम कर रही थी। यह किस दिन फटेगा यह तो वक़्त ही जानता था। हमेशा से मेरे मन में विचार आते थें कि लोग कैसे किसी और इंसान को कठपुतली की तरह नियंत्रित करते होंगे , खुद इंसान होकर भी दूसरों को पालतू जानवर समझ लेते हैं , प्रभु ने ऐसे लोगों को धरती पे क्यों भेजा होगा , इत्यादि कई सारी बातें थी जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
Give respect to elders not identity or self confidence...Be brave...Cow is such a beautiful animal..peaceful & calm...but knows when to kick :)
ReplyDeleteWe need to learn this lesson.., I feel...like that...
yes, totally agree with u....
Delete