adhmari zindagi
पैरों तले ज़मीन खिसकना सुना था , मगर कमरे के बाहर रखी व्हील चेयर का गायब हो जाना पहली बार देखा था। एक तो टाकों में दर्द, बिना व्हील चेयर के चलना और लौटने का रास्ता भी भूल गयी। कोई रिश्तेदार भी साथ नहीं थे उस वक़्त। अपनी फटी किस्मत पर रोना आ रहा था।
धीरे धीरे दीवार के सहारे चलते चलते, लोगों से पूछकर, अपने वार्ड तक पहुंच गयी। उन दिनों मोबाइल बहुत कम होते थे , एक परिवार में केवल एक फ़ोन, वह भी सिर्फ घर के मुख्या के पास, तो किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पायी। पिताजी ने मेरी हालत देख कर तुरंत अस्पताल के व्यवस्था अध्यक्ष से भेट की , लेकिन किस्मत में एक भी व्हील चेयर हाथ नहीं लगी। सारी चेयर्स काफी मरीज़ों के लिए व्यस्त थी। प्रशासन ने माफ़ी माँगते हुए एडजस्ट करने को कहा। पिताजी निराश लौट आये।
कुछ ही देर में फिर बच्ची को दूध पिलाने बुलवाया। नर्स ने बताया हर दो घंटे में दूध पिलाने जाना होगा। यह सुनकर मेरे सर पर जैसे पहाड़ गिर पड़ा, क्योंकि वार्ड से आई सी यू तक का फ़ासला कम से कम ८००-९०० मीटर था , वह भी बिना व्हील चेयर के आना जाना बहुत भारी था। एक घंटा तो आने जाने में , आधा घंटा दूध पिलाना सीखने और बच्ची को पीना सिखाने में ही गुज़र जाता। वार्ड लौटकर आधा घंटा सुस्ताऊँ उतने में फिर परेड। बिलकुल ज़िंदा लाश लग रही थी मैं।
पहले सोचती थी एक बार बच्चा पेट से बाहर आजाये, फिर मैं निश्चिन्त हो जाऊँगी। मगर इसका उल्टा ही हुआ , बच्ची के जनम के बाद चौगुनी ज्यादा हाज़री देनी पड़ रही थी। एहसास हुआ कि पेट में थी तो ज्यादा सही था। यह अधमरी ज़िन्दगी का बोझ और झेला नहीं जा रहा था।
माँ मेरे साथ साथ परेड करने लगी। जब भी हम बच्ची को किरणों में सोता देखते तो सहम जाते कि यह कितने साल तक जी पाएगी। बच्ची जब नींद में तेज़ चौक उठती तो कोई भी उसको प्यारी थपकी देने के लिए पास नहीं था यह एहसास दिलाने कि डरो मत हम सब पास है। वह शीशे की पेटी में साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी मगर किसी का भी अंदर जाना सख्त मना था। बेबसी क्या होती है यह मैंने तब समझा था।
धीरे धीरे दीवार के सहारे चलते चलते, लोगों से पूछकर, अपने वार्ड तक पहुंच गयी। उन दिनों मोबाइल बहुत कम होते थे , एक परिवार में केवल एक फ़ोन, वह भी सिर्फ घर के मुख्या के पास, तो किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पायी। पिताजी ने मेरी हालत देख कर तुरंत अस्पताल के व्यवस्था अध्यक्ष से भेट की , लेकिन किस्मत में एक भी व्हील चेयर हाथ नहीं लगी। सारी चेयर्स काफी मरीज़ों के लिए व्यस्त थी। प्रशासन ने माफ़ी माँगते हुए एडजस्ट करने को कहा। पिताजी निराश लौट आये।
कुछ ही देर में फिर बच्ची को दूध पिलाने बुलवाया। नर्स ने बताया हर दो घंटे में दूध पिलाने जाना होगा। यह सुनकर मेरे सर पर जैसे पहाड़ गिर पड़ा, क्योंकि वार्ड से आई सी यू तक का फ़ासला कम से कम ८००-९०० मीटर था , वह भी बिना व्हील चेयर के आना जाना बहुत भारी था। एक घंटा तो आने जाने में , आधा घंटा दूध पिलाना सीखने और बच्ची को पीना सिखाने में ही गुज़र जाता। वार्ड लौटकर आधा घंटा सुस्ताऊँ उतने में फिर परेड। बिलकुल ज़िंदा लाश लग रही थी मैं।
पहले सोचती थी एक बार बच्चा पेट से बाहर आजाये, फिर मैं निश्चिन्त हो जाऊँगी। मगर इसका उल्टा ही हुआ , बच्ची के जनम के बाद चौगुनी ज्यादा हाज़री देनी पड़ रही थी। एहसास हुआ कि पेट में थी तो ज्यादा सही था। यह अधमरी ज़िन्दगी का बोझ और झेला नहीं जा रहा था।
माँ मेरे साथ साथ परेड करने लगी। जब भी हम बच्ची को किरणों में सोता देखते तो सहम जाते कि यह कितने साल तक जी पाएगी। बच्ची जब नींद में तेज़ चौक उठती तो कोई भी उसको प्यारी थपकी देने के लिए पास नहीं था यह एहसास दिलाने कि डरो मत हम सब पास है। वह शीशे की पेटी में साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी मगर किसी का भी अंदर जाना सख्त मना था। बेबसी क्या होती है यह मैंने तब समझा था।
Reading your blogs always takes me to a very emotional feel.
ReplyDeleteno intensions to play with readers emotions, but just pure feelings of the person's life shared....
Delete