kadhva swar
कढ़वा स्वर , यह सबने पहली बार सुना और महसूस किया था। रोते तो सभी बच्चे हैं, लेकिन बिलकुल हट कर तीखी ध्वनि शायद ही किसी ने सुनी हो। एक हफ्ता हो चुका था आई सी यू में , लेकिन जबसे बच्ची ने ढ़ंग से स्थन पान करना शुरू किया , तबसे आधी रात में बहुत ही कढ़वी आवाज़ में रोने लगी। नर्स सब परेशान हो गयी , इंजेक्शन से पाउडर का दूध पिलाने पर भी चुप नहीं होती थी। पूरी रात उन्होंने बच्ची को संभालने में बितायी ताकि बाकी बच्चों की नींद न उड़ जाए।
जब आठवे दिन बच्ची को दूध पिलाने गयी तो नर्स ने सारा हाल सुनाया। अभी हमको अंदाज़ा नहीं था कि कैसी आवाज़ में रोने की बात कर रही थी नर्स । उस रात फिर वही रोना शुरू हुआ और नर्स हार कर बच्ची को मेरे पास ले आयी। माँ ने सब तरीके से बच्ची की जाँच करके देखा ,कोई संकेत नहीं मिल रहा था। न पेट फूला हुआ था , न भूक सता रही थी , न कोई और वजह समझ आ रही थी।
पहले मैं कम से कम रात को तो चैन से सोती थी , अब वह भी नसीब में नहीं रहा। बच्ची इतनी ऊँची आवाज़ में रो रही थी मानो कोई उसको बेरहमी से पीट रहा हो और वह दर्द से चीक रही हो। रोज़ रात को ढ़ाई बजे रोना शुरू होता , तो सुबह के अज़ान की आवाज़ सुनकर बंद होता। मामला किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों होता था।
अस्पताल के सारे लोग उसकी चीख़ती हुई रोने की आवाज़ से परेशान हो जाते। बार बार कोई न कोई आकर कहता कृपया चुप कराओ इसको। दिन में तो आम बच्चों की तरह सिर्फ गीला करने पर, या भूख लगने पर रोती थी। आधी रात में पता नहीं क्या हो जाता उसको।
यह पता लगाने के लिए डॉक्टर साहब ने एक चार्ट पकड़ाया मुझे, जिसमें पल पल का रिकॉर्ड रखना था कितने बजे बच्ची ने पोट्टी , उल्टी , पेशाब किया , कितने बजे दूध पिया , कितने बजे जागी , कितने बजे सोयी और कितनी बार रोयी कितनी देर में चुप हुई। मुझे तो यह ज़िम्मेदारी नर्क की सज़ा जैसे लग रही थी। कोई एक दो दिन की सज़ा नहीं थी बल्की पूरे ढ़ाई साल तक झेलना पड़ा।
जब आठवे दिन बच्ची को दूध पिलाने गयी तो नर्स ने सारा हाल सुनाया। अभी हमको अंदाज़ा नहीं था कि कैसी आवाज़ में रोने की बात कर रही थी नर्स । उस रात फिर वही रोना शुरू हुआ और नर्स हार कर बच्ची को मेरे पास ले आयी। माँ ने सब तरीके से बच्ची की जाँच करके देखा ,कोई संकेत नहीं मिल रहा था। न पेट फूला हुआ था , न भूक सता रही थी , न कोई और वजह समझ आ रही थी।
पहले मैं कम से कम रात को तो चैन से सोती थी , अब वह भी नसीब में नहीं रहा। बच्ची इतनी ऊँची आवाज़ में रो रही थी मानो कोई उसको बेरहमी से पीट रहा हो और वह दर्द से चीक रही हो। रोज़ रात को ढ़ाई बजे रोना शुरू होता , तो सुबह के अज़ान की आवाज़ सुनकर बंद होता। मामला किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों होता था।
अस्पताल के सारे लोग उसकी चीख़ती हुई रोने की आवाज़ से परेशान हो जाते। बार बार कोई न कोई आकर कहता कृपया चुप कराओ इसको। दिन में तो आम बच्चों की तरह सिर्फ गीला करने पर, या भूख लगने पर रोती थी। आधी रात में पता नहीं क्या हो जाता उसको।
यह पता लगाने के लिए डॉक्टर साहब ने एक चार्ट पकड़ाया मुझे, जिसमें पल पल का रिकॉर्ड रखना था कितने बजे बच्ची ने पोट्टी , उल्टी , पेशाब किया , कितने बजे दूध पिया , कितने बजे जागी , कितने बजे सोयी और कितनी बार रोयी कितनी देर में चुप हुई। मुझे तो यह ज़िम्मेदारी नर्क की सज़ा जैसे लग रही थी। कोई एक दो दिन की सज़ा नहीं थी बल्की पूरे ढ़ाई साल तक झेलना पड़ा।
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