madad ki guhaar
हर कोई यही सोचता है कि दुःख के बादल एक दिन छट जाएँगे , लेकिन कब तक , यह कोई नहीं सोचता। मेरी तकलीफों का सिलसिला कब तक चलने वाला था इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता था।
चौथे दिन से बच्ची को स्थन पान कराने के लिए आई सी यू के बगल वाले फीडिंग रूम में बुलवाया गया। वहाँ नर्स ने चेतना, चेतना आवाज़ लगायी। बच्ची के पैर पर लेबल लगाया हुआ था जिस पर चेतना लिखा हुआ था। मैंने कहा यह तो मेरा नाम है, बच्ची का नहीं। नर्स ने बताया कि सभी शिशुओं को उनकी माँ के नामों से ही पहचाना जाता हैं। बाकी सभी शिशुओं को नर्स ने दो हाथों के सहारे पकड़कर उनकी माता को दिया , लेकिन जब मेरी बच्ची की बारी आयी तो नर्स केवल एक हथेली पर पेट के बल लिटा कर देने आयी।
मैं तो हैरान होगयी इतनी छोटी सी बच्ची को देख कर। डिलीवरी के बाद जब कुछ क्षण के लिए पहली बार उसे देखा था तो अंदाज़ा नहीं था कि साधारण तौर पर शिशु थोड़े उससे बड़े होते हैं , करीब ढ़ाई तीन किलो के। लेकिन मेरी बच्ची तो केवल सवा किलो की थी। मैंने नर्स से कहा ऐसे कैसे इतने छोटे बच्चे को चिकन की तरह लटका कर लाए हो, कुछ हो जाता तो बच्ची को .... लेकिन वह जल्दी में चली गयी।
पहली बार छोटे से बच्चे को गोद में लिया था , पकड़ना भी नहीं आ रहा था। बाकी सभी स्त्रियों को देखा कि वे कैसे संभाल रही हैं , फिर भी मुझसे हो नहीं रहा था। मैंने नर्स को मदद के लिए आवाज़ दी , मगर उन्होने कहा यह उनकी ड्यूटी नहीं। मैंने मिन्नत की एक बार सीखा दो , तो सिर्फ एक हाथ नीचे और एक हाथ ऊपर करवा कर चली गयी।
अब मुझे शर्म आरही थी कि स्थन पान कैसे करवाऊँ। फिर से नर्स को बुलाया , वह चिढ़ने लगी और कहा इतना भी नहीं जानती , आगे से अपने एक रिश्तेदार को साथ लाना कहकर एक तकिए को मेरी गोद में रख कर बच्ची को उस पर लिटा कर चली गयी।
वहाँ बैठे सब लोग मुझे देख रहे थे , और मैं और भी ज़्यादा परेशान हो रही थी कि बच्ची को दूध पीना नहीं आ रहा और कोई मदद के लिए भी नहीं। उतने में वक़्त ख़त्म हो गया। मैंने कहा बच्ची ने एक बूँद भी दूध नहीं पिया , तो नर्स ने कहा वे इंजेक्शन से पाउडर का दूध पिला देंगे। मैं अपने वार्ड लौटने लगी तो.....
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