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adhikaari abhi neend mein hain

शहरों की चका चौंध  में सब तरक्की की गुमाँ में हैं। अपनी अपनी नीजी ज़िन्दगी की जुस्तजू में हैं। यह ऐसा जहान है जहाँ सबका जिस्म जागा हुआ है मग़र , ज़मीर नींद में है। अगर किसी को ज़रा सा भी वक़्त मिल जाए तो दूसरों की , कमियाँ ढूंढ़ने में है। एक सवाल हर बार जागा हुआ है , मगर जवाब नींद में है। अभी निर्दय ज़माने की हैवानियत से बेख़बर, जाने कितनी ही बच्चियाँ, हवस के शिकारी घेरों में हैं। सुलग रही है मेरे दिल में इन्तक़ाम की हज़रत ,और समाज चेहरे पे नक़ाब डाले , नींद में है। बहूतों के मन में इंक़लाब उठता है देखके दरिंदों की दरिंदगी , कब मिलेगा इन्साफ़, यही सवाल हर कन्या के मन में कब से जागा हुआ है....... मगर प्रषासन अभी तक नींद में है। शायद बड़ी बड़ी हस्तियों के साथ ऐसी हैवानियत होती नहीं, इसीलिए सभी अपने अपने आराम गृह में , सुकून की नींद में हैं। सवाल हर लड़की की सुरक्षा का अभी भी जागा हुआ है , मगर मौत का फर्मान सुनाने वाले अधिकारी , अभी तक भी नींद में है।

paaras mani

पारस मणि को कभी देखा तो नहीं , हाँ मगर एक पारस तुल्य इंसान को देखकर निःशब्द हो गई। अस्पताल से आने के बाद अगले दिन सुबह बच्ची को पीलिया का इंजेक्शन लगवाना था। बड़े भैया , मैं और दीदी बच्ची को लेकर घर से निकले। ३ मंज़िला इमारत में कोई लिफ्ट की सुविधा नहीं थी। ऑपरेशन के टाकों में दर्द के साथ चढ़ना उतरना पडता था। नीचे गेट पर पहोंच कर मैं भैया की ऐन्टैसर बाइक ढूंड रही थी चलने के लिए , मगर भैया ने रिक्शा बुक कर लिया था। रिक्शा में बैठकर मैंने भैया से कहा पास के ही क्लिनिक में जाने के लिए रिक्शा बुक करने की ज़रुरत नहीं थी। आप अपनी बाइक पे दो बारी में मुझे और दीदी को एक एक करके ले जाते। भैया ने कहा अभी कुछ दिनों तक रिक्शा में जाना सही रहेगा। क्लिनिक पहुंचने के बाद जब बच्ची के कनोला में इंजेक्शन डालने लगे तो भैया से देखा नहीं गया, और वे बाहर जा खड़े हुए। जब फीस देने लगे तो भैया इशारे में डॉक्टर साहब को कुछ कह रहे थे। दीदी मुझे लेकर बाहर आगई। तब तक मैंने दीदी से पुछा की भैया की मोटर साइकिल नहीं दिख रही थी पार्किंग में , कहाँ रखी है उन्होंने। तो दीदी ने बताया शायद सर्विस के लिए दी होगी। ...

shikaayatein.....

तारीफ़ों का दौर कहीं पीछे छूट गया था। अब तो शिकायतों का दौर शुरू हुआ था। अस्पताल में तो लोग बच्ची के रोने की आवाज़ से परेशान थे ही ,धीरे धीरे पड़ोसी और घरवाले भी परेशान होने लगे।  जिस दिन घर पहुंचे थे उसी रात मकान मालिक घर आकर बोले उनकी तबियत ठीक नहीं , बच्ची के रोने के शोर से आराम नहीं कर पा रहे थे।  पिताजी  ने पालने की डोरी को अपने पैर के अँगूठे पर बाँध दिया और सारी रात सोते सोते अपना पैर हिलाते रहे ताकि बच्ची झूलते झूलते सो जाए।  जब पिताजी घंटों ऐसे करते करते थक जाते तो माँ बच्ची को अपने सीने पे उल्टा लिटा कर हिलाती रहती। जब वह थक जाती तो छोटा भाई बच्ची को पालने में सुलाकर ख़ुद ज़मीन पर सो जाता और पालने को नीचे से अपनी हथेली से ऊपर नीचे करता जाता , मानो वह जिम में कसरत करता जा रहा था जब तक वह थक नहीं जाता।  इन सब में दीदी कहाँ पीछे रहने वाली थी , वह भी बच्ची को लेकर पूरे घर में परेड करती, जबकि वह गर्भवती थी। बड़े भैया ने भी अपना योग दान दिया। उन्होंने पालना टीवी के पास रख दिया और टीवी की आवाज़ करके पालने को झुलाते ...

abhyaas adhyayan saamagri

कैसा लगेगा अगर कोई आपको इंसान नहीं बल्कि एक अभ्यास सामग्री के रूप में इस्तेमाल करे ? एक पल के लिए ऐसा हो भी जाए तो हम सहयोग कर सकते है, लेकिन बार बार तो नहीं ना। ऐसी स्थिति हो जाए तो हम बोल कर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर सकते हैं , लेकिन नन्हें शिशु कैसे झेल सकते हैं। बच्ची को केवल दिन भर के लिए ही आई सी यू में रखने लगे, बाकी रात ९ बजे से सुबह ९ बजे तक मेरे पास ही सँभालने को देते। दसवे दिन से एक एक करके अस्पताल के छात्र छात्राएँ बच्ची को देखने आते और उनके सीनियर सोती हुई बच्ची का सिर हथेली में उठाते और एक ऊँचाई से छोड़ देते , यह सुनिश्चित करने कि बच्ची दिमागी तौर पर ठीक है या नहीं। बच्ची डर कर ज़ोर से रोने लगती , फिर भी एक छात्र बच्ची के फेफड़ों की आवाज़ सुनता , एक वज़न तौलता , तो एक सिर का माप और लम्बाई नापता। बिचारि छोटी सी जान , सभी के अभ्यास अध्ययन की सामग्री बन गई थी। मुझसे तो यह सब देखा नहीं जा रहा था। एक तो पूरी रात जागरण करो बच्ची को संभालने में फिर सुबह वह सोने लगे तो छात्रों की भीड़ उमड़ कर   सारी शान्ति भंग कर देते। पहले से ही बच्ची को यातनाएँ...

kadhva swar

कढ़वा स्वर , यह सबने पहली बार सुना और महसूस किया था। रोते तो सभी बच्चे हैं, लेकिन बिलकुल हट कर तीखी ध्वनि शायद ही किसी ने सुनी हो। एक हफ्ता हो चुका था आई सी यू में , लेकिन जबसे बच्ची ने ढ़ंग से स्थन पान करना शुरू किया , तबसे आधी रात में बहुत ही कढ़वी आवाज़ में रोने लगी। नर्स सब परेशान हो गयी , इंजेक्शन से पाउडर का दूध पिलाने पर भी चुप नहीं होती थी। पूरी रात उन्होंने बच्ची को संभालने में बितायी ताकि बाकी बच्चों की नींद न उड़ जाए। जब आठवे दिन बच्ची को दूध पिलाने गयी तो नर्स ने सारा हाल सुनाया। अभी हमको अंदाज़ा नहीं था कि कैसी आवाज़ में रोने की बात कर रही थी नर्स । उस रात फिर वही रोना शुरू हुआ और नर्स हार कर बच्ची को मेरे पास ले आयी। माँ ने सब तरीके से बच्ची की जाँच करके देखा ,कोई संकेत नहीं मिल रहा था। न पेट फूला हुआ था , न भूक सता रही थी , न कोई और वजह समझ आ रही थी। पहले मैं कम से कम रात को तो चैन से सोती थी , अब वह भी नसीब में नहीं रहा। बच्ची इतनी ऊँची आवाज़ में रो रही थी मानो कोई उसको बेरहमी से पीट रहा हो और वह दर्द से चीक रही हो। रोज़ रात को ढ़ाई बजे रोना शुरू होता...

adhmari zindagi

पैरों तले ज़मीन खिसकना सुना था , मगर कमरे के बाहर रखी व्हील चेयर का गायब हो जाना पहली बार देखा था। एक तो टाकों में दर्द, बिना व्हील चेयर के चलना और लौटने का रास्ता भी भूल गयी। कोई रिश्तेदार भी साथ नहीं थे उस वक़्त। अपनी फटी किस्मत पर रोना आ रहा था। धीरे धीरे दीवार के सहारे चलते चलते, लोगों से पूछकर, अपने वार्ड तक पहुंच गयी। उन दिनों मोबाइल बहुत कम होते थे , एक परिवार में केवल एक फ़ोन, वह भी सिर्फ घर के मुख्या के पास, तो किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पायी। पिताजी ने मेरी हालत देख कर तुरंत अस्पताल के व्यवस्था अध्यक्ष से भेट की , लेकिन किस्मत में एक भी व्हील चेयर हाथ नहीं लगी।  सारी चेयर्स काफी मरीज़ों के लिए व्यस्त थी।  प्रशासन ने माफ़ी माँगते हुए एडजस्ट करने को कहा। पिताजी निराश लौट आये। कुछ ही देर में फिर बच्ची को दूध पिलाने बुलवाया। नर्स ने बताया हर दो घंटे में दूध पिलाने जाना होगा। यह सुनकर मेरे सर पर जैसे पहाड़ गिर पड़ा, क्योंकि वार्ड से आई सी यू तक का फ़ासला कम से कम ८००-९०० मीटर था , वह भी बिना व्हील चेयर के आना जाना बहुत भारी था। एक घंटा...

madad ki guhaar

हर कोई यही सोचता है कि दुःख के बादल एक दिन छट जाएँगे , लेकिन कब तक , यह कोई नहीं सोचता। मेरी तकलीफों का सिलसिला कब तक चलने वाला था इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता था।  चौथे दिन से बच्ची को स्थन पान कराने के लिए आई सी यू के बगल वाले फीडिंग रूम में बुलवाया गया। वहाँ नर्स ने चेतना, चेतना आवाज़ लगायी। बच्ची के पैर पर लेबल लगाया हुआ था जिस पर चेतना लिखा हुआ था। मैंने कहा यह तो मेरा नाम है, बच्ची का नहीं। नर्स ने बताया कि सभी शिशुओं को उनकी माँ के नामों से ही पहचाना  जाता हैं। बाकी सभी शिशुओं को नर्स ने दो हाथों के सहारे पकड़कर उनकी माता को दिया , लेकिन जब मेरी बच्ची की बारी आयी तो नर्स केवल एक हथेली पर पेट के बल लिटा कर देने आयी।  मैं तो हैरान होगयी इतनी छोटी सी बच्ची को देख कर। डिलीवरी के बाद जब कुछ क्षण के लिए पहली बार उसे देखा था तो अंदाज़ा नहीं था कि साधारण तौर पर शिशु थोड़े उससे बड़े होते हैं , करीब ढ़ाई तीन किलो के। लेकिन मेरी बच्ची तो केवल सवा किलो की थी। मैंने नर्स से कहा ऐसे कैसे इतने छोटे बच्चे को चिकन की तरह लटका कर लाए हो, कुछ हो जाता तो बच्ची क...

bhool bhulaiyya

प्राचीन चिकित्सालय साधारण एक मंजिला इमारत होते थे। अगर उनको अपनी सेवाएँ बढ़ानी होती थी तो अगल बगल और कमरें बनवाते जाते , मगर कभी ऊपरी मंजिल का निर्माण नहीं करते थे। मेरे लिए ऐसा अस्पताल एक भूल भुलैय्या के जैसा प्रतीत हो रहा था। एक विशाल प्रवेश द्वार के अंदर एक और द्वार , उसके अंदर एक और द्वार, उसके भी अंदर एक और द्वार, सिलसिला ज़ारी था। ऐसा प्रतीत हो रहा था , मानो किसी रेल गाडी के बोघी के अंदर चले जा रहे हो। जिस कमरे में काम हो वहाँ रुक जाओ। जगह तो काफ़ी खुली खुली थी , मगर ढंग के साइन बोर्ड न होने के कारण बहुत उलझन होती थी। हँसी तो बहुत आती थी उस भूल भुलैया में आने जाने में , लेकिन ठीक से हँस भी नहीं पाती थी ऑपरेशन के टाकों में दर्द की वजह से। मुझे उस अस्पताल के एक जनरल वार्ड में भर्ती कराया गया, क्योंकि बच्ची को आई सी यू में  रखा हुआ था। परिवार के किसी भी सदस्य ने दुबारा बच्ची को देखा नहीं था। दो दिन तक बच्ची को तेज़ किरणों के प्रभाव में रखा था। तीसरे दिन से एक छोटी सी स्टील कि डिबिया में माँ का दूध मंगवाती थी नर्स। बहुत ही दर्दनाक हालत थी ...

mata pita ka karz

यह सच है कि ख़ुदा के बाद माता पिता का दर्जा पूजनीय होता है। यह मैंने तब महसूस किया जब घर के सभी लोग बच्चों के ख़ास अस्पताल में थे और पिताजी और मैं नर्सिंग होम में थे। मेरी डिलीवरी का खर्चा १५००० रुपए था जो डॉक्टर साहिबा ने पुरानी जान पहचान की वजह से कम कीमत लगायी थी , लेकिन पिताजी ने सोचा था कि नॉर्मल डिलीवरी होगी तो सिर्फ ५००० रुपए ही देने होंगे। मगर बिल उनके आसक्ति के हिसाब से तीन गुना अधिक था, और वे केवल १०००० रुपए जुटा पाए थे। उस दिन मैं डॉक्टर से रख रखाव के बारे में पूछने जा रही थी कि मैंने देखा पिताजी डॉक्टर साहिबा के चरणों में बैठे बिनती कर रहे थे कि उनसे जितना बन पड़ा उतना कर दिया , बाकी माफ़ कर दे। मुझे लगा भला डॉक्टर लोग डिस्कॉउंट देने के बाद भी कभी और अधिक छूट देते हैं ? शायद मुझे अस्पताल में ही रखेंगे जब तक पूरा बिल न चुका दे। लेकिन डॉक्टर साहिबा ने पिताजी की आँखें सच्चाईयी से भरी नम देखी तो उन्हे उठाया और कहा कोई बात नहीं अगर उनकी फीस न मिले, केवल टीम की फीस और बाकी चीज़ों का खर्चा चुका दे। यह देख कर मेरा दिल भर आया। पिताजी की सीख याद आ रही थी कि भले लोग...

sanjeevani davaaiyan

सुना था कि भगवान उसी की परीक्षा लेते रहते है जो सक्षम होता है। लेकिन मैंने माँ , पिताजी, भैया और दीदी को भी मेरे साथ साथ परीक्षा देते हुए देखा था। बहुत उब चुके थे ज़िन्दगी से सब ,पता नहीं कब ख़त्म होगा उतार चढ़ाव का खेल। डॉक्टर साहिबा ने एक लम्बी सी पर्ची दी दवाइयाँ लाने के लिए , मगर पिताजी ने सोचा एक दो दिन में पैसों का इंतजाम हो जाएगा तब इकहट्टी ले आयेंगे दवाई। रात भर दर्द से रोती रही जैसे कोई हाथी के पैरों से रौंदी गयी हो। न मुझे पता था ना घरवालों को कि उस सूची में एक दर्द सुन्न करने की दवाई भी थी जो डॉक्टर साहिबा ने पहले लाने को कहा था। घर में किसी को भी पहले किसी बड़े ऑपरेशन का अनुभव नहीं था तो तकलीफ़ सहन करनी पड़ी, क्यों की उन दिनों मेडिकल स्टोर रात भर नहीं खुले रहते थे। एक भली नर्स ने मुझे नींद का इंजेक्शन लगा दिया और मैं सो गयी। अगले दिन सुबह दर्द भयंकर हो गया। पिताजी दौड़े दवाई लाने , मगर दुकान देर से खुलती थीं। दोपहर के बारह बजे तक सारी दवाईयाँ ले आये और हर पल मेरे पास ही बैठे रहे। भैया बच्ची के कागज़ी काम में लगे हुए थे। माँ और दीदी बच्...

kaal chakra

सुबह के ठीक १० बजे एक पल का मौन हुआ फिर मेरी आँखों पर एक कपडा डाल दिया गया। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था , लेकिन आवाज़ सुनाई दे रही थी "अरे बच्चा रो नहीं रहा , जल्दी करो , मारो मारो" मन को धक्का लगा मनो दुनिया ख़त्म हो गयी हो , इतने में ज़ोर से मारने की आवाज़ आयी। मौन को चीरती हुई पहली किलकारी ऐसे प्रतीत हो रही थी मानो कितने कर्मों का दण्ड भोगने इस धरती पर आना पड़ा हो। बच्चे की आवाज़ सुनकर फिर मैं बेहोश हो गयी। शाम के ४ बजे होश आया तो देखा आस पास पूरा परिवार है , लेकिन बच्चा नहीं। मैंने पापा से पूछा दूर के चाचाजी जो मेरे सगे नन्दोई लगते है , उनको अभी ही क्यों बुलाया अस्पताल। पिताजी ने बताया कि सिर्फ उन्हीं का ब्लड ग्रुप मेरे ब्लड ग्रुप से मैच हुआ , इसलिए तुरंत मेरी मदद के लिए आ गए। यह जान कर बहुत ख़ुशी हुई। उनको  बहुत धन्यवाद किया। एक मेरे मौसाजी भी थे वहाँ जो कई सालों से हमारे घर आते नहीं थे। मेरे बचपन के मोह ने उनको भी मजबूर कर दिया एक आखरी बार मुझे एक नज़र देखने को। बस मुझे होश में आता हुआ देख वहाँ से चल दिए। मैंने दीदी को बुलाकर पूछा...

dimaagi khalal

उन दिनों ऑपरेशन सिर्फ़ किसी ख़ास वजह से ही हुआ करता था , अधिकतर सभी डिलीवरी साधारण कुदरती तौर पे ही होती थीं। इसलिए कई लोगों को यह भी नहीं पता था कि ऑपरेशन को सिज़ेरियन भी कहते है। लोग ऑपरेशन का होना बहुत बड़ी बात मानते थे, इसलिए मेरा पूरा परिवार गहरी चिंता में था और मैं डॉक्टरों की बातें सुनकर डॉक्टरी के नए शब्द सीख रही थी। जी हाँ , मैंने भी सिज़ेरियन शब्द पहली बार ही सुना था , और ऑपरेशन के वक़्त सोच रही थी कि इतिहास के एक पाठ में जूलियस सीज़र के बारे में पढ़ा था , लेकिन यह सब ऑपरेशन को सिज़ेरियन क्यों कह रहे हैं , इसके बारे में कभी नहीं पढ़ा। उतने में डॉक्टर साहिबा ने मुझसे पूछा "चेतना , चेतना , मेरी आवाज़ सुन रही हो , बात करो मुझसे।" मैंने कहा हाँ सुन पा रही हूँ , और हैरत में पड़ गई , यह क्या मैं तो बेहोश हुई ही नहीं , लेकिन जब थाइरोइड का ऑपरेशन हुआ था तब तो मैं बेहोश थी कई घंटे। अब एक पल के लिए घबराहट हुई कि पेट काटेंगे तो दर्द होगा तो क्या करूँगी।   डॉक्टर साहिबा ने फिर कहा पैर हिला के देखो , कुछ महसूस हो रहा है क्या? , मैंने कहा नहीं। बड़ी गुदगु...

maut ka farmaan

बाहरी हलचल से बेखबर मैं ऑपरेशन के लिए तैयार हो गई। बहुत देर से मैंने माँ और पिताजी को देखा नहीं था, बस डॉक्टर साहिबा की आवाज़ सुनाई दे रही थी कि जल्द से जल्द ब्लड़ डोनर का इंतज़ाम कीजिए। माँ की हल्की हल्की आवाज़ आ रही थी कि इतने महीने बेटी ने दुःख देखा है, बच तो जाएंगे न..... मैं सोचने लगी कि माँ ऐसे क्यों बात कर रही है, पता नहीं क्या चल रहा है बाहर। मैं पूछना चाहती थी सब मगर कोई नर्स भी मेरे पास नहीं थी , इतने में डॉक्टर साहिबा आ गई। उन्होने ने मुझे एक कागज़ पर दस्तख़त करने को कहा यह बता कर कि मेरा पेट पूरी तरह से सिकुड़ गया है और खून भी काफी बह गया है तो किसी एक जान को बचाने की कोशिश कर सकते है। मेरी राय मांगी कि बच्चे को या मुझे बचाना है , और मैंने तुरंत कहा बच्चे को बचालो, मुझे तो वैसे भी नहीं जीना। मैंने बहुत ख़ुशी से अपने मौत के फरमान पर दस्तख़त कर दिया। डॉक्टर साहिबा ने कहा देखते हैं क्या होता है और जल्दी जल्दी और डॉक्टरों को मेरी स्थिति बताई। सारे टीम वाले हैरान होकर बोले ऐसा तो पहला केस देखा है उनके जीवन में और सबने भगवान को प्रार्थना करके ऑपरेशन शु...

rookhe ko bhi hasna sikha diya

क्या ज़माना था , उन दिनों डॉक्टर सिर्फ मरीज़ की सेवा का उद्देश्य रखते थे, मगर इस नए दौर में चंद ही ऐसे डॉक्टर है कहीं कहीं। डॉक्टर साहिबा ने मुझे एक और नर्स को सौंप दिया और खुद शिशु विशेषज्ञ को तुरंत आने को कहा , साथ ही बाकी टीम को भी बुलवाया। नर्स ने मुझे पहली मंजिल पर चलने को कहा , तो मैंने नादानी में कहा कोई बात नहीं मैं नीचे इंतज़ार करती हूँ आपका , आप ज़रूरी सामान नीचे ले आओ , ख़ामख़ा सारा अस्पताल गन्दा हो जायेगा। नर्स भड़क गयी, बस जल्दी चलने का हुक्म दिया। पता नहीं क्यों उस दिन बड़ी निश्चिन्त थी, जहाँ सब लोग हड़बड़ी मचा रहे थे , वहाँ मैं आराम से बातों में पड़ी थी , कोई तेज़ी नहीं दिखा रही थी। मुझे लग रहा था कि निश्चिन्त रहने से शायद बी.पी कम हो जाएगा, और एक फूले पेट से भी जल्द ही छुटकारा मिल जाएगा क्योंकि मैं सोचती थी कि गर्भावस्था में ८ महीनों तक दो ज़िन्दगी का ध्यान अकेले रखना पड़ा वह भी बड़ी नाज़ुकी से ,  बच्चे के जनम के बाद एक ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाऊँगी। परिवार के लोग तो संभाल ही लेंगे बच्चे को, तो मैं जैसे चाहे वैसे बैठ उठ सकती हूँ बादमें। आज यह सब याद करके हंसी आती ...

baaton ki ladi

कभी ऐसा व्यक्ति देखा है किसी ने जो मुश्किल घडी में उत्सुक बच्चे की तरह हर चीज के बारे में पूछे यह क्या है, वो क्या है..... शायद कोई हो भी कहीं , एक मैं भी थी। क्योंकि मेरे साथ उस वक़्त घर का कोई व्यक्ति नहीं था, तो मैं नर्स से हर बात के लिए सवाल कर रही थी। जब तक डॉक्टर जाग कर नीचे आते, तब तक नर्स मुझे एक कमरे में ले गयी और बेड पे लेटने को कहा। वह बेड अजीब था, छोटा सा , थोड़ा गोल कटा हुआ , तो मैंने पुछा यह तो टूटा हुआ है और छोटा भी, मैं कैसे सोऊँ इस पर। नर्स ने मुझे विनम्रता से बताया कि वह बेड ऐसा ही होता है ताकि डॉक्टर आसानी से जाँच कर सके। फिर मैंने एक और सवाल किया कि अगर मैं इस पर लेट गयी तो सब गन्दा हो जाएगा , आपको साफ़ करने की परेशानी होगी। तो नर्स थोड़ा मुस्काई और कहा तुम उसकी चिंता मत करो, बस लेट जाओ। उनकी बात मानली और जैसे ही लेटी पहले ही माफ़ी माँगली , मेरी वजह से हुई वहाँ गंदगी के लिए। फिर मैंने पुछा डॉक्टर अपने घर क्यों नहीं गयी , उनके परिवार वाले नाराज़ होंगे उनसे कि अभी भी वे मेरी वजह से अस्पताल में ही है। अब नर्स थोड़ी परेशान हो रही थी मेरी बातों से , तो उन्होंने...

honi anhoni...

 किस्मत भी क्या क्या खेल दिखाती है।चाहे कितना भी गीता का पाठ पढ़ा हो, कितनी ही पूजा अर्चना करली हो, फिर भी होना वही होता है जो किस्मत में लिखा होता है। दीदी से मिलने के बाद अगले दिन कहीं बहार खाना खाने जाने का तय किया था। वैसे तो मेरा आठवां महीना शुरू होक १० दिन हुए थे , और डॉक्टर ने भी एक महीने बाद की डिलीवरी की तारिक बताई थी। इसलिए सुबह जल्दी नहाने चली गयी। अब मुझे तो कुछ पता नहीं था कि डिलीवरी के पहले क्या लक्षण होते हैं , और ना ही माँ ने कभी ज़िक्र किया, न ही डॉक्टर कुछ इसके बारे में बताया कभी। मुझे कोई दर्द भी नहीं उठा था। बस नहाते वक़्त, नल के पानी के बहाव की तरह ख़ून का बहाव शुरू हो गया था। यह देखकर मुझे कोई घबराहट नहीं हुई थी यह सोच कर कि शायद आखरी महीने में ऐसा ही होता होगा। मगर थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही थी तो माँ को बुलाया।  माँ तो देखते ही बावली सी हो गयी , पूरे घर के लोगों को हिला दिया , सबको कोई न कोई काम बताया। मुझसे बार बार मिन्नतें कर रही थी कि जिस हालत में मैं हूँ वैसे ही बाथरूम से बाहर निकल आऊँ। मगर मैं नही...

pyar ka khazana

 स्टेशन पर दोनों भाई मुझे लेने पहुंच गए थे जैसे कोई मुख्य अतिथि को लेने आये हो। ऐसा लगना वाजिब भी था क्योंकि छोटे भाई के जनम के बाद घर में सालों बाद किलकारी गूँजने वाली थी। ज़्यादातर सभी लोगों को नन्हे बच्चे बहुत प्रिय लगते हैं। ख़ास करके मेरे बड़े भैया को तो बच्चियों से बहुत लगाव है , इसलिए वे दुआ करते थे कि उनकी संतान एक बेटी हो।  घर पहुंच कर सबने बहुत सारी यादें ताज़ा की। माँ के हाथ का खाना खाके बेहद संतुष्टि हुई। रोज़ शाम को ,बारी बारी से पिताजी और बड़े भैया व  छोटा भाई , मेरे पैरों की मालिश किया करते थे। मेरी सूजन को देखकर उनको मेरी चिंता अधिक होने लगी। जाँच करवाने पर पता चला कि बी.पी अधिक बढ़ा हुआ था। इसको नियंत्रित करने के लिए दवाई ली।  वे दिन ज़िन्दगी के बेहद खुशनुमा दिन थे , ऐसा लगता था जैसे एक अर्सा बीत गया हो आराम किये , जो मायके में सारी तमन्नाएँ पूरी हो गयी। मेरा वज़न ४ किलो बढ़ गया था केवल एक ही हफ्ते में। लेकिन मेरी किस्मत कभी आसान सफर पर नहीं ले जाती। आगे की कल्पना किसीने नहीं की थी। तब तक दीदी का फ़ोन आया कि वह भी माँ बनने वाली थी। उ...

dil toh bachha hai

बंधन कई प्रकार के होते हैं , उनमें से सबसे अनमोल है माँ की ममता। मेरी गोद भराई का कार्यक्रम रखा गया। मेरे माता पिता को भी बुलवाया गया। जिस तरह कोई नन्हा बालक पहली बार पाठशाला से घर आते ही माँ और बाबा से लिपट जाता है , उसी प्रकार मैं भी बहुत महीनों बाद माँ को देखकर गले लग गयी जिससे कलेजे में ठंडक पड़गई। उन दिनों पहली डिलीवरी के लिए मायके जाने का रिवाज़ था। इस अधिकार को भी बड़ी मुश्किल से पाया था मैंने। ससुरजी को मेरे पिताजी के काम धंदे की परेशानियों का अंदाज़ा था , इसलिए वे नहीं चाहते थे की मेरा खर्चा मेरे पिताजी का बोझ बढ़ादे। पिताजी काफी क़र्ज़ में डूबे हुए थे , फिर भी वे मुझे लेने आये थे क्योंकि मैं उनकी लाड़ली थी। माताजी को मेरे गर्भ की स्थिति मालूम थी इसलिए मुझे सफर में भेजना नहीं चाहते थे। उन्हें लगता था की उनका होने वाला पोता कही मेरे मायके जाने की ज़िद्द में दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म न हो जाए। मुझे उस वक़्त सबको मनाने में बहुत वक़्त लगा। आख़िर कार जब जीवन साथी से फ़ोन पे पूछा गया कि क्या निर्णय लेना होगा भेजने के बारे में तो उन्होंने निःसंकोच कह दि...

toph mein barood

मुसीबत जब आती है तो चारों ओर से आती है। माताजी को लगा घर का काम कर नहीं सकती तो बैठे बैठे ५ साड़ियाों में कुंदन लगा सकती है। वे अपनी बेटियों को भेठ देना चाहती थी। भविष्य के खतरे से अंजान मैंने वह काम शुरू कर दिया। तकलीफ तो हो रही थी घंटों बैठे रहने में, एक एक नग बराबर की दूरी पर लगाने के लिए झुकना भी पड़ रहा था, वो भी प्रेस को ज़ोर से दबाकर चिपकाने पड़ रहें थें । एक दो बार माताजी को बताया कि तकलीफ होती है उस काम में , तो उन्होंने मुझे मेरी बहन के घर जाने को कहा। मन की मुराद पूरी हो रही थी। शादी के बाद पहली बार उनसे मिलने जा रही थी। ख़ुशी में अपने दुःख दर्द सब भूल रही थी। लेकिन माताजी ने कहा बस कुछ घंटों के लिए जाना है और वे साड़ियों का काम वहाँ पूरा करना है। यह तो वही बात हो गई कि चाहे इधर मारो या उधर, मरना तो निश्चित है। फिर भी सोचा कम से कम दीदी और जीजाजी से मिलना हो जाएगा।  मगर वहां पहुंच कर मेरे काम की वजह से किसी से भी ठीक से बात ना कर सकी। माताजी बार बार फ़ोन करके घर जल्दी आने को कहते रहे सो दीदी के परिवार वाले मुझे घर पहुंचा गए। जब मेरा जनम दिन आया तो ससुरा...

jeevan maran ka daav

सर्दियों के दिन शुरू हो गए थे। वह मेरी पहली सर्दी थी इसलिए ज़्यादा अनुभव नहीं था कि पहन ने ओढ़ने के लिया क्या व्यवस्था होनी चाहिए। मैं तो दक्षिण भारत से थी जहाँ बारहों महीने एक जैसा मौसम था , ना अधिक गर्मी और ना ही कड़ी ठंडी , बस हल्की बारिश रोज़। एक तो गर्भवती होने के कारण असक्ति और बेचैनी थी ऊपर से सर्दी बर्दास्त नहीं हो रही थी। जीवन में पहली बार कोहरा , उम्मस , हीटर , कूलर आदि देखें थें। गर्मी और सर्दी से बचाव के तरीके भी नहीं आते थे। हालत बहुत बिगड़ती जा रही थी। कुछ महीनों बाद माताजी ने पूछा कि उनके आने की ज़रुरत है क्या , तो हमने मना कर दिया कि कोई दिक्कत नहीं है। असल में माताजी को घुटने की तकलीफ थी, तो घर के भीतर प्रवेश द्वार से कमरे तक जाने के लिए हर रोज़ सीढ़ियां चढ़नी उतरनी पड़ती थी वह भी कई कई बार , जिससे माताजी को बहुत तकलीफ हुई थी , और बिस्तर की भी कमी थी , ऊपर से वह मकान बस एक शेड और दीवारों से बना था जहाँ धूप बिलकुल भी नहीं आती थी। ऐसे में माताजी को और तकलीफ ना हो जाए यह सोच कर अपनी परेशानियाँ ख़ुद सँभालना सही समझा। मेरा छठा महीना लग गया था। ठंड से पेट अकड़ गया था। शुरुवाती दिनो...